ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर्स के ब्लड डोनेशन पर रोक क्यों? सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दी सफाई

Blood Donation Rules

मुनादी लाइव : भारत में रक्तदान से जुड़े नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस सामने आई है। ट्रांसजेंडर समुदाय और सेक्स वर्कर्स को रक्तदान करने की अनुमति नहीं दिए जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने Supreme Court of India में अपना पक्ष स्पष्ट किया है।

सरकार ने अदालत को बताया कि यह निर्णय किसी प्रकार के भेदभाव के आधार पर नहीं लिया गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित है।

सरकार ने क्या कहा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में कहा कि कई स्वास्थ्य अध्ययनों में यह पाया गया है कि ट्रांसजेंडर समुदाय और सेक्स वर्कर्स में एचआईवी संक्रमण का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक होता है।

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सरकार के अनुसार रक्तदान की प्रक्रिया में रक्त की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। यदि किसी समूह में संक्रमण का जोखिम अधिक पाया जाता है, तो रक्त आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता है।

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स्वास्थ्य सुरक्षा को बताया प्राथमिकता
सरकार ने अदालत को बताया कि रक्तदान से जुड़े दिशा-निर्देश राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा मानकों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इनका उद्देश्य किसी भी संभावित संक्रमण को रक्त आपूर्ति प्रणाली में प्रवेश करने से रोकना है।

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सरकार के मुताबिक यह नियम केवल ट्रांसजेंडर समुदाय या सेक्स वर्कर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे कई अन्य समूह भी हैं जिन पर चिकित्सा कारणों से रक्तदान से संबंधित प्रतिबंध लागू होते हैं।

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याचिका में उठाया गया भेदभाव का सवाल
इस मामले में दाखिल याचिका में कहा गया था कि ट्रांसजेंडर समुदाय को रक्तदान से रोकना समानता और मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नीति समुदाय के साथ भेदभाव करती है।

हालांकि सरकार ने अदालत में कहा कि यह निर्णय किसी सामाजिक या लैंगिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जोखिम के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर लिया गया है।

रक्तदान नीति पर व्यापक चर्चा
इस मामले ने देश में रक्तदान नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े नियमों पर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्तदान के नियमों को तय करते समय दो बातों के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है—एक ओर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और दूसरी ओर सामाजिक समानता।

अब इस मामले में अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाया जाएगा, जिससे भविष्य में भारत की रक्तदान नीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

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