झारखंड में कुड़मी आंदोलन के खिलाफ आदिवासी समाज और ट्राइबल Gen Z का धरना

रांची में ट्राइबल Gen Z का विरोध रांची में ट्राइबल Gen Z का विरोध

राजभवन के सामने आदिवासी समाज का बड़ा प्रदर्शन, कहा – “कुड़मी को आदिवासी सूची में शामिल नहीं होने देंगे”

रांची: झारखंड में कुड़मी समाज के रेल टेका आंदोलन के जवाब में अब आदिवासी समाज और ट्राइबल Gen Z संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है। शनिवार को रांची के राजभवन के सामने आदिवासी समाज के लोगों ने जमकर नारेबाजी की और कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने का विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि कुड़मी समाज को किसी भी हाल में आदिवासी नहीं बनने दिया जाएगा।

कुड़मी समाज की मांग और आदिवासियों का विरोध
कुड़मी समाज पूरे झारखंड में रेल टेका आंदोलन चला रहा है। वे खुद को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। वहीं, आदिवासी समाज के लोगों ने राजधानी रांची में राजभवन के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनका कहना है कि कुड़मी समाज के लोगों को देश में पहले से ही ओबीसी का दर्जा प्राप्त है। ये कभी आदिवासी नहीं थे, इसलिए इन्हें आदिवासी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

“जबरन कोई आदिवासी नहीं बन सकता” – हर्षिता मुंडा
धरना स्थल पर मौजूद हर्षिता मुंडा ने कहा, “अगर संविधान ने कुड़मी समाज को रेल रोकने का अधिकार दिया है, तो हमें भी धरना-प्रदर्शन का अधिकार मिला है। हम यहां अपनी बात केंद्र सरकार तक पहुंचाने के लिए बैठे हैं। जबरन कोई आदिवासी नहीं बन सकता। हम आज भी कुड़मी समाज को अपना पड़ोसी मानते हैं, लेकिन हमारे आरक्षण और अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं होने देंगे।”

आरक्षण और जमीन की सुरक्षा का सवाल
हर्षिता ने आगे कहा, “कुड़मी लोग रेल रोक रहे हैं। इसके विरोध में हम राजभवन के समक्ष धरना दे रहे हैं। कुड़मियों को किसी भी हाल में आदिवासी नहीं बनने देना है। अगर वे आदिवासी बन गए, तो हमारा आरक्षण, हमारी जमीन, हमारी नौकरी और मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक के पद का हमारा आरक्षण खत्म हो जाएगा।”

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“देशभर में कुड़मी ओबीसी, झारखंड में आदिवासी क्यों?” – के मुंडा
समाजसेवी के मुंडा ने कहा, “कुड़मी समुदाय पूरे देश में ओबीसी श्रेणी में है। फिर झारखंड के कुड़मी आदिवासी क्यों बनना चाहते हैं? यह उनकी नाजायज मांग है। आजादी के पहले कौन क्या था, यह हमें नहीं मालूम, लेकिन आजादी के बाद जब संविधान बना, तब इनके प्रतिनिधियों ने कभी नहीं कहा कि वे आदिवासी हैं। उनका आंदोलन सिर्फ 10 साल पुराना है, जबकि वे कहते हैं कि यह 70 साल पुराना है।”

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“फिर होगा उलगुलान” – आदिवासी समाज
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर यह मामला शांत नहीं हुआ, तो झारखंड में फिर नया उलगुलान होगा और इस बार “आर-पार की लड़ाई” होगी। वर्ष 2022 में भी आदिवासी समाज ने मोरहाबादी मैदान में बड़ी रैली की थी। इस बार भी आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी दी गई है।

राजभवन और आसपास के इलाकों में सुरक्षा कड़ी
कुड़मी आंदोलन के विरोध में आदिवासी समाज के विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए राजभवन और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। पुलिस की अतिरिक्त तैनाती की गई है और पूरे इलाके में पैनी नजर रखी जा रही है।

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