24 साल पुराने छत्रपति हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम बरी, हाई कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

Gurmeet Ram Rahim

मुनादी लाइव: 24 वर्ष पुराने चर्चित छत्रपति हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बड़ी कानूनी राहत मिली है। पंजाब और हरयाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में उन्हें बरी कर दिया है।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं और संदेह की स्थिति में आरोपी को लाभ दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर न्यायालय ने पूर्व में दिए गए दंडादेश को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए राम रहीम को दोषमुक्त कर दिया।

मामला क्या था ?
यह मामला वर्ष 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या से जुड़ा था। रामचंद्र छत्रपति सिरसा से प्रकाशित होने वाले एक स्थानीय समाचार पत्र के संपादक थे। उन्होंने डेरा सच्चा सौदा से जुड़े कुछ संवेदनशील मुद्दों को अपने समाचार पत्र में प्रकाशित किया था।

इसके बाद अक्टूबर 2002 में अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोली चला दी थी। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद मामला काफी चर्चा में रहा और इसकी जांच बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपी गई।

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निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की विशेष अदालत ने वर्ष 2021 में गुरमीत राम रहीम और अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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हालांकि इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध करना संभव नहीं है।

न्यायालय का तर्क
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहियों में कई विरोधाभास पाए गए। न्यायालय के अनुसार ऐसे मामलों में जहां दोष सिद्धि को लेकर संदेह की स्थिति हो, वहां आरोपी को संदेह का लाभ देना न्यायिक सिद्धांत का हिस्सा है।

इसी आधार पर अदालत ने पूर्व के निर्णय को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए राम रहीम को इस मामले में दोषमुक्त घोषित किया।

विवादों में रहा मामला
छत्रपति हत्याकांड देश के चर्चित मामलों में से एक रहा है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पहले भी कई मामलों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं।

हालांकि इस मामले में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद कानूनी और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। अब आगे इस फैसले को लेकर अन्य कानूनी विकल्पों पर भी चर्चा की जा रही है।

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