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अमेरिका में H-1B वीजा पर गए हजारों भारतीयों पर संकट, नौकरी गई तो अब डिपोर्ट का खतरा

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वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 15 हजार भारतीय कर्मचारी छंटनी की मार झेल चुके हैं और अब उन पर अमेरिका छोड़ने का खतरा मंडरा रहा है। ये सभी भारतीय H-1B Visa के तहत अमेरिका गए थे। लेकिन नौकरी जाने के बाद अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमित समय में नई नौकरी और नया स्पॉन्सर ढूंढने की है।

60 दिनों की समय सीमा बनी सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों के मुताबिक, यदि किसी H-1B कर्मचारी की नौकरी चली जाती है, तो उसे नया नियोक्ता खोजने के लिए केवल 60 दिनों का समय मिलता है। यदि इस अवधि में नया स्पॉन्सर या एम्प्लॉयर नहीं मिलता, तो संबंधित व्यक्ति को अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। टेक सेक्टर में लगातार हो रही छंटनी के बीच हजारों भारतीय पेशेवर इसी दबाव में हैं।

ट्रम्प प्रशासन के नए नियमों से बढ़ी परेशानी
Donald Trump प्रशासन द्वारा इमिग्रेशन और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को लेकर अपनाए जा रहे सख्त रुख ने भारतीय पेशेवरों की चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में अब कई बदलाव किए गए हैं। पहले जहां कई लोग अमेरिका में रहते हुए “Adjustment of Status” के जरिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पूरी कर लेते थे, वहीं अब आवेदकों को अपने मूल देश वापस जाकर आवेदन करने की प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।

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इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर उन भारतीयों पर पड़ सकता है, जो लंबे समय से H-1B वीजा पर अमेरिका में कार्यरत हैं।

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भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स सबसे ज्यादा प्रभावित
अमेरिका में भारतीय मूल के बड़ी संख्या में कर्मचारी टेक और आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं।
हाल के महीनों में कई बड़ी टेक कंपनियों द्वारा लागत कम करने और पुनर्गठन के नाम पर हजारों कर्मचारियों की छंटनी की गई है। इसका सीधा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि H-1B वीजा सिस्टम नियोक्ता आधारित होता है, इसलिए नौकरी छूटते ही वीजा स्टेटस भी खतरे में पड़ जाता है।

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परिवारों के सामने भी संकट
कई भारतीय पेशेवर वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं और उनके परिवार, बच्चों की पढ़ाई तथा भविष्य भी वहीं जुड़ा हुआ है। ऐसे में अचानक नौकरी छूटने और वीजा संकट ने हजारों परिवारों को मानसिक और आर्थिक दबाव में ला दिया है। सोशल मीडिया और भारतीय समुदायों के बीच नौकरी खोजने और कानूनी सलाह लेने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

ग्रीन कार्ड बैकलॉग पहले से बड़ी समस्या
भारतीय पेशेवर पहले ही अमेरिकी ग्रीन कार्ड बैकलॉग की समस्या से जूझ रहे हैं। रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए भारतीयों को कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। अब यदि नियम और सख्त होते हैं, तो उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि नई नीतियों का असर खासतौर पर मध्यम और वरिष्ठ स्तर के भारतीय कर्मचारियों पर अधिक पड़ेगा।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था में भारतीयों का बड़ा योगदान
भारतीय पेशेवर लंबे समय से अमेरिकी टेक इंडस्ट्री, रिसर्च, हेल्थकेयर और इंजीनियरिंग सेक्टर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों में भारतीय मूल के कर्मचारी और अधिकारी शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर वीजा संकट और डिपोर्टेशन की आशंका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई है।

अमेरिका में H-1B वीजा पर काम कर रहे हजारों भारतीयों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती नौकरी बचाने और वैध इमिग्रेशन स्टेटस बनाए रखने की है। यदि जल्द नई नौकरी और स्पॉन्सर नहीं मिले, तो कई भारतीयों को मजबूरी में अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। ट्रम्प प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीतियों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

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