संचार साथी ऐप पर बवाल: विपक्ष ने कहा—‘दूसरा पेगासस’, केंद्र ने दी सफाई

Privacy Debate

मोदी सरकार के साइबर सुरक्षा ऐप पर सियासत तेज—विपक्ष ने लगाया निजता भंग और जासूसी का आरोप, सरकार बोली—यह वैकल्पिक और सुरक्षित, कोई निगरानी नहीं

नई दिल्ली: संचार साथी ऐप, जिसे भारत सरकार का दूरसंचार विभाग साइबर सुरक्षा और टेलीकॉम फ्रॉड से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफ़ॉर्म बता रहा है, आज विपक्ष और केंद्र सरकार के बीच नए टकराव का कारण बन गया है। यह ऐप 2023 में वेब पोर्टल के रूप में शुरू हुआ था और 17 जनवरी 2025 को एंड्रॉयड और iOS दोनों प्लेटफॉर्म पर लॉन्च किया गया। इसके अब तक 5 करोड़ से अधिक डाउनलोड होने की पुष्टि की गई है।

विवाद तब गहराया जब यह खबर सामने आई कि दूरसंचार विभाग ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को निर्देश दिया है कि मार्च 2026 से बनने वाले सभी नए स्मार्टफोन्स में यह ऐप अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल होगा और इसे न तो अनइंस्टॉल किया जा सकेगा और न ही डिसेबल। पुराने फोन में इसे सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से जोड़ा जाएगा। सरकार का दावा है कि इस ऐप की मदद से अब तक 50,000 से अधिक चोरी हुए फोन रिकवर किए जा चुके हैं और लाखों फर्जी सिम और संदिग्ध IMEI की पहचान संभव हुई है।

विपक्ष की कड़ी आपत्ति—“यह पेगासस का नया रूप, भारतीयों पर नजर रखने की तैयारी”
मोदी सरकार के इस फैसले से विपक्ष का आक्रोश चरम पर है। कई नेताओं ने इसे देश के नागरिकों की निजता पर हमला बताया और कहा कि यह सीधे-सीधे निगरानी का औजार है। कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम ने इसे “पेगासस प्लस प्लस” करार दिया और कहा कि यह पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है।

विपक्ष पेगासस कांड का हवाला देते हुए कह रहा है कि जिस तरह बिना किसी क्लिक या डाउनलोड के पेगासस किसी के भी फोन में घुस सकता था, उसी तरह संचार साथी ऐप को अनइंस्टॉल न होने देना यह संकेत देता है कि सरकार नागरिकों के फोन में घुसने की क्षमता चाहती है। पेगासस इजरायल की कंपनी NSO ग्रुप द्वारा विकसित दुनिया के सबसे शक्तिशाली जासूसी सॉफ्टवेयर में से एक है, जो कॉल, मैसेज, फोटो, लोकेशन, कैमरा, माइक्रोफोन और यहां तक कि व्हाट्सएप–टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप्स को भी चुपके से एक्सेस कर सकता है। विपक्ष का आरोप है कि इसी मॉडल को भारत में दोहराने की तैयारी हो रही है।

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कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इसे “बिग ब्रदर” की मानसिकता बताते हुए कहा कि सरकार लोगों की निजी जिंदगी में ताक-झांक करना चाहती है और यह लोकतंत्र में अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि यह आदेश पूरी तरह गैर-कानूनी है और केंद्र सरकार बार-बार नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रही है।

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कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने तो सीधा आरोप लगाया कि मोदी सरकार 11 वर्षों से भारतीयों के मौलिक अधिकारों को कुचल रही है और यह ऐप उसी सोच का हिस्सा है।

शशि थरूर का नरम रुख—“ऐप उपयोगी है, लेकिन जबरन थोपना सही नहीं”
संचार साथी विवाद में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने थोड़ा अलग मत रखा है। उन्होंने ऐप को उपयोगी माना और कहा कि साइबर सुरक्षा के लिए ऐसे टूल जनता को मदद करते हैं। लेकिन उनका कहना है कि किसी भी लोकतंत्र में किसी ऐप को जबरन लागू करना अनुचित है।

थरूर का कहना है कि यह ऐप तभी बेहतर काम करेगा जब लोग इसे अपनी इच्छानुसार डाउनलोड करें। सरकार को मीडिया रिपोर्टों के जरिए आदेश जारी करने के बजाय जनता को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए कि यह ऐप कैसे काम करता है और इससे क्या लाभ हैं।

केंद्र सरकार की सफाई—“यह जासूसी ऐप नहीं, वैकल्पिक और सुरक्षित प्लेटफ़ॉर्म”
विवाद बढ़ने के बाद केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सामने आए और उन्होंने विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। सिंधिया ने कहा कि संचार साथी ऐप किसी भी प्रकार की कॉल मॉनिटरिंग या निगरानी का साधन नहीं है। यह पूर्णतः सुरक्षित है और इसका उद्देश्य केवल लोगों को डिजिटल ठगी, नकली मोबाइल और साइबर अपराधों से बचाना है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिंधिया ने यह भी स्पष्ट किया कि यह ऐप अनिवार्य नहीं है। उनके अनुसार नागरिक यदि चाहे तो ऐप को एक्टिवेट करें और यदि न चाहें तो बिल्कुल भी इसका उपयोग न करें। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि कोई नागरिक ऐप को हटाना चाहता है, तो वह इसे डिलीट भी कर सकता है। मंत्री की यह सफाई सीधे-सीधे उन खबरों का खंडन करती है जिनमें कहा गया था कि ऐप अनइंस्टॉल नहीं होगा।

बढ़ता विवाद और जनता में भ्रम
एक ओर सरकार इसे सुरक्षा का औजार बता रही है, दूसरी ओर विपक्ष इसे जासूसी का रास्ता बता रहा है। दोनों पक्षों के विरोधाभासी दावों से जनता के बीच भ्रम बढ़ता जा रहा है। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सरकार ऐप की तकनीकी क्षमताओं, डेटा प्राइवेसी और यूजर कंट्रोल से संबंधित विवरण सार्वजनिक नहीं करती, तब तक विवाद खत्म होने की संभावना कम है।

फिलहाल यह ऐप एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल चुका है, और आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़क तक इसकी गूंज सुनाई देना तय है।

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