दीपिका प्रसाद प्रकरण: रांची में पुलिस-अधिवक्ता टकराव गहराया, काला बिल्ला लगाकर ड्यूटी

High Court Controversy

हाईकोर्ट परिसर में कथित अभद्रता के बाद पुलिस एसोसिएशन का ऐलान, तीन दिन प्रतीकात्मक विरोध

रांचीः झारखंड की राजधानी रांची में पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। डोरंडा थाना प्रभारी दीपिका प्रसाद के साथ झारखंड उच्च न्यायालय परिसर में कथित अभद्र व्यवहार को लेकर झारखंड पुलिस एसोसिएशन की रांची जिला शाखा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। एसोसिएशन ने इसे महिला पुलिस अधिकारी के सम्मान और पूरी पुलिस व्यवस्था पर हमला करार देते हुए तीन दिनों तक काला बिल्ला लगाकर ड्यूटी करने का निर्णय लिया है।

क्या है पूरा मामला?
घटना की शुरुआत अधिवक्ता मनोज टंडन से जुड़े एक विवाद से हुई। आरोप है कि उन्होंने अपनी कार के बोनट पर एक व्यक्ति को घसीटा। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद पुलिस ने तत्काल प्राथमिकी दर्ज की और संबंधित वाहन को जब्त कर लिया।

पुलिस एसोसिएशन के अनुसार, जब्त वाहन को छुड़ाने के लिए थाना प्रभारी पर दबाव बनाया गया। मामला न्यायालय तक पहुंचा और इसी दौरान डोरंडा थाना प्रभारी दीपिका प्रसाद हाईकोर्ट पहुंचीं। आरोप है कि वहां प्रदर्शन कर रहे कुछ अधिवक्ताओं ने उन्हें घेर लिया और अपमानजनक व्यवहार किया। प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, उन्हें वर्दी उतरवाने और जेल भेजने तक की धमकियां दी गईं। साथ ही पुलिस बल को ‘कठपुतली’ जैसे शब्दों से संबोधित किया गया।

पुलिस एसोसिएशन का विरोध
इस घटना को पुलिस एसोसिएशन ने न्यायालय जैसी गरिमामयी जगह पर महिला अधिकारी के प्रति अकल्पनीय आचरण बताया है। घटना के बाद रांची जिला शाखा की आकस्मिक बैठक बुलाई गई, जिसमें सर्वसम्मति से विरोध दर्ज कराने का निर्णय लिया गया।

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तय हुआ कि 28 फरवरी से 2 मार्च तक रांची जिले के सभी पुलिस अधिकारी और कर्मी काला बिल्ला लगाकर अपनी ड्यूटी निभाएंगे। एसोसिएशन ने साफ कहा कि यह विरोध किसी संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि पुलिस बल की गरिमा की रक्षा के लिए है।

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राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल
यह मामला केवल पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच टकराव तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक गलियारों में भी इसे लेकर चर्चा तेज है। एक ओर पुलिस बल अपने सम्मान और अधिकारों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अधिवक्ता समुदाय इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देख रहा है।

प्रशासनिक स्तर पर भी स्थिति को संवेदनशील माना जा रहा है। राजधानी में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाली पुलिस यदि आंदोलन के मूड में है, तो इसका व्यापक असर पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल आंदोलन प्रतीकात्मक है और पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान काला बिल्ला लगाकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।

कार रिलीज, लेकिन विवाद बरकरार
उधर, शुक्रवार देर शाम अधिवक्ता की जब्त कार को आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद डोरंडा थाने से रिलीज कर दिया गया। लेकिन इस फैसले के बावजूद पुलिस-अधिवक्ता विवाद शांत होता नहीं दिख रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण ने न्यायिक और पुलिस तंत्र के बीच समन्वय और संवाद की आवश्यकता को उजागर किया है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह टकराव और गहरा सकता है।

फिलहाल रांची में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में प्रशासन और न्यायिक समुदाय इस विवाद को किस तरह सुलझाते हैं। पुलिस का काला बिल्ला आंदोलन भले ही प्रतीकात्मक हो, लेकिन इसके पीछे का संदेश स्पष्ट है—पुलिस बल अपने सम्मान से समझौता करने को तैयार नहीं।

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