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धनबाद: नीरज सिंह हत्याकांड में 8 साल बाद बहस पूरी, 27 अगस्त को फैसला; पूर्व विधायक संजीव सिंह समेत सभी आरोपियों को पेश होने का आदेश

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धनबाद: झारखंड के सबसे बहुचर्चित राजनीतिक हत्याकांडों में से एक — पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह हत्याकांड — में आखिरकार आठ साल बाद सुनवाई के अंतिम चरण में प्रवेश हो गया है। बुधवार को एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष जज डीसी अवस्थी की अदालत में अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच अंतिम बहस पूरी हो गई। अदालत ने 27 अगस्त 2025 को फैसला सुनाने की तारीख तय कर दी है और साथ ही झरिया के पूर्व विधायक संजय सिंह समेत सभी आरोपियों को उस दिन कोर्ट में मौजूद रहने का आदेश दिया है, जिनमें वे आरोपी भी शामिल हैं जो फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

अभियोजन पक्ष के तर्क — चश्मदीद गवाह, मोबाइल कॉल और लोकेशन पुख्ता सबूत
अंतिम बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि इस केस में उनके पास ऐसे सबूत हैं, जो आरोपियों की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से साबित करते हैं।

  • अभियोजन के मुताबिक, चश्मदीद गवाह आदित्य राज वारदात के समय मौके पर मौजूद थे और उन्होंने घटना को अपनी आंखों से देखा।
  • कोर्ट में यह भी बताया गया कि मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और लोकेशन ट्रैकिंग से यह साबित होता है कि वारदात के समय कई आरोपी घटनास्थल के आसपास मौजूद थे।

गवाहों के बयानों में आपसी मेल और घटनाक्रम की सटीकता को अभियोजन ने “मजबूत आधार” बताते हुए कहा कि इससे हत्या की साजिश और क्रियान्वयन दोनों साबित होते हैं।

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बचाव पक्ष का पलटवार — CDR से गवाह की मौजूदगी पर सवाल
दूसरी तरफ बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी को पूरी तरह नकार दिया।

  • उनका मुख्य तर्क यह था कि वारदात के समय आदित्य राज गिरिडीह में थे, न कि सरायढेला के स्टील गेट के पास।
  • बचाव पक्ष ने CDR और लोकेशन रिकॉर्ड को आधार बनाते हुए कहा कि अभियोजन के दावे तकनीकी रूप से गलत हैं।
  • बचाव वकीलों ने अदालत में कहा कि गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते और कई बिंदुओं पर विरोधाभास हैं।
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क्या था नीरज सिंह हत्याकांड?
21 मार्च 2017 की शाम, धनबाद के सरायढेला स्थित स्टील गेट इलाके में शहर दहल उठा था। पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह, उनके अंगरक्षक और दो सहयोगियों की ताबड़तोड़ फायरिंग में हत्या कर दी गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार —

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इस हत्याकांड की साजिश 11 फरवरी 2017 को बिहार के कैमूर में रची गई थी।

घटना में कई हथियारबंद अपराधी शामिल थे, जिन्होंने योजनाबद्ध तरीके से हमला किया।

बचाव पक्ष का कहना है कि यह पूरी कहानी झूठी है और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते फर्जी फंसाया गया है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और असर
नीरज सिंह की हत्या ने उस समय धनबाद की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। नीरज सिंह झरिया के पूर्व विधायक संजय सिंह के चचेरे भाई थे और दोनों के बीच वर्षों से वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। नीरज सिंह की छवि एक उभरते युवा नेता की थी, जो स्थानीय निकाय चुनाव में जीत के बाद तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे। हत्या के बाद शहर में तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण देखने को मिला था।

लंबी कानूनी जंग और देरी के कारण
इस केस में गवाहों के बयान, सबूतों की तकनीकी जांच, आरोपियों की पेशी में देरी और कई बार तारीख बढ़ने के कारण मुकदमा लंबा खिंच गया। आठ साल बाद भी इस मामले का फैसला आना यह दिखाता है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में न्याय प्रक्रिया कितनी जटिल और समय लेने वाली हो सकती है। इस दौरान कई आरोपी जेल में रहे, तो कुछ को जमानत मिल चुकी है।

27 अगस्त को ऐतिहासिक फैसला
अब पूरे शहर की निगाहें 27 अगस्त पर टिकी हैं, जब अदालत यह तय करेगी कि संजय सिंह समेत आरोपी दोषी हैं या बरी। अगर अदालत अभियोजन पक्ष के पक्ष में फैसला देती है, तो यह झारखंड के सबसे बड़े राजनीतिक अपराध मामलों में एक बड़ी कानूनी जीत मानी जाएगी। वहीं, अगर बचाव पक्ष के तर्क मजबूत साबित होते हैं, तो यह मामला झारखंड की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर सकता है।

नीरज सिंह हत्याकांड न केवल एक आपराधिक केस है, बल्कि यह झारखंड की राजनीति, सत्ता संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता का प्रतीक भी बन चुका है। आठ साल की लंबी सुनवाई के बाद आने वाला यह फैसला धनबाद की राजनीतिक और सामाजिक दिशा को भी प्रभावित करेगा।

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