335 वर्षों से रांची की पहचान बना जगन्नाथ मेला, जहां आस्था, इतिहास और संस्कृति एक साथ खींचते हैं लाखों कदम
रांची से कुमार अमित की रिपोर्ट
मुनादी लाइव विशेष: झारखंड की राजधानी रांची का नाम आते ही जहां प्राकृतिक सौंदर्य और झरनों की छवि सामने आती है, वहीं इस शहर की पहचान एक ऐसी ऐतिहासिक धार्मिक परंपरा से भी जुड़ी है, जो तीन शताब्दियों से अधिक समय से लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है। धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर और यहां लगने वाला जगन्नाथ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक गौरव का जीवंत उत्सव है। हर वर्ष आषाढ़ माह में आयोजित होने वाले इस मेले में लाखों श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। लगभग 335 वर्ष पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है, जैसी इसकी शुरुआत के समय थी।
1691 में हुई थी जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना
रांची के धुर्वा स्थित पहाड़ी पर बने जगन्नाथपुर मंदिर का निर्माण वर्ष 1691 ईस्वी में तत्कालीन बरकागढ़ रियासत के नागवंशी शासक ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने कराया था। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर का निर्माण ओडिशा के प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी की स्थापत्य शैली से प्रेरित होकर किया गया। यही कारण है कि मंदिर की वास्तुकला और धार्मिक परंपराओं में पुरी की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। करीब 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थापत्य कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यहां से पूरे रांची शहर का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है, जिससे यह स्थान पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है।

रथयात्रा से शुरू हुई मेले की परंपरा
मंदिर निर्माण के बाद से ही प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथयात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई। इसी रथयात्रा के साथ जगन्नाथ मेला आयोजित होने लगा। रथयात्रा के दौरान भगवान की प्रतिमाओं को विशेष रूप से तैयार किए गए विशाल रथ पर विराजमान कर मंदिर से मौसीबाड़ी तक ले जाया जाता है। हजारों श्रद्धालु रस्सियां पकड़कर रथ को खींचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान के रथ को खींचने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है तथा उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
झारखंड के सबसे पुराने मेलों में एक
जगन्नाथ मेला झारखंड के सबसे पुराने और सबसे बड़े धार्मिक मेलों में गिना जाता है। समय के साथ इसका स्वरूप लगातार विस्तृत हुआ है। पहले जहां यह आयोजन स्थानीय स्तर तक सीमित था, वहीं आज इसमें झारखंड के सभी जिलों के अलावा ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य हिस्सों से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। रथयात्रा के दिन पूरा जगन्नाथपुर क्षेत्र श्रद्धालुओं से भर जाता है। “जय जगन्नाथ” के उद्घोष, शंखध्वनि, घंटियों की आवाज और भक्ति गीतों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
धार्मिक आयोजन के साथ सांस्कृतिक महोत्सव
रांची का जगन्नाथ मेला केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। यह झारखंड की लोक संस्कृति का भी सबसे बड़ा मंच है। मेले में नागपुरी, मुंडारी, कुड़ुख, संथाली और अन्य जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं।
लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, लोकगीत, रंग-बिरंगी झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले को विशेष पहचान देते हैं। यह आयोजन राज्य की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिलता है सहारा
जगन्नाथ मेला स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों के लिए भी बड़ा अवसर लेकर आता है। मेले में हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के खिलौने, पारंपरिक आभूषण, बांस के उत्पाद, कृषि उपकरण, घरेलू सामान और स्थानीय खाद्य पदार्थों की सैकड़ों दुकानें सजती हैं। झारखंड के विभिन्न जिलों से आने वाले कारीगर और छोटे व्यापारी इस मेले के माध्यम से अपनी कला और उत्पादों को हजारों ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलता है।
बच्चों और परिवारों का पसंदीदा मेला
धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह मेला परिवारों के लिए मनोरंजन का भी प्रमुख केंद्र है। विशाल झूले, सर्कस, मौत का कुआं, खिलौनों की दुकानें, पारंपरिक मिठाइयां, चाट, पकौड़ी और स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं।
यही कारण है कि यह मेला हर आयु वर्ग के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
प्रशासन की रहती है विशेष तैयारी
हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन व्यापक सुरक्षा व्यवस्था करता है। पुलिस बल की तैनाती, सीसीटीवी निगरानी, ट्रैफिक प्रबंधन, चिकित्सा शिविर, पेयजल, अग्निशमन दल और आपदा प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की जाती है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो। इसके अलावा नगर निगम और विभिन्न विभाग मिलकर सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य नागरिक सुविधाएं सुनिश्चित करते हैं।
धार्मिक पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जगन्नाथ मेला और जगन्नाथपुर मंदिर का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यह झारखंड के धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दिला सकता है। हर वर्ष लाखों लोगों की मौजूदगी यह साबित करती है कि यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार द्वारा भी समय-समय पर मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण और आधारभूत सुविधाओं के विकास के प्रयास किए जाते रहे हैं।
बदलते समय में भी कायम है परंपरा
डिजिटल युग और तेजी से बदलती जीवनशैली के बावजूद रांची का जगन्नाथ मेला अपनी मूल परंपराओं को संजोए हुए है। यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, इतिहास और धार्मिक विरासत से जोड़ने का कार्य कर रहा है। यही वजह है कि हर वर्ष लाखों लोग इस मेले का हिस्सा बनकर न केवल भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा को भी करीब से महसूस करते हैं।
करीब 335 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा रांची का जगन्नाथ मेला आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, गौरव और साझा सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा उत्सव बन चुका है। यही ऐतिहासिक निरंतरता इसे देश के प्रमुख पारंपरिक मेलों में विशिष्ट स्थान दिलाती है।






