सम्मान मिला, वादे मिले… लेकिन पढ़ाई के लिए नहीं मिले 16 हजार रुपये
JAC इंटर आर्ट्स की स्टेट टॉपर हैं छोटी कुमारी
487 अंक लाकर पूरे झारखंड में हासिल किया था पहला स्थान
16 हजार रुपये हॉस्टल फीस नहीं भर पाने से पढ़ाई प्रभावित
प्रशासन ने भी हरसंभव सरकारी सहयोग का भरोसा दिलाया था, लेकिन अब तक नहीं मिली सहायता
बोकारो/रांची: झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) की इंटर आर्ट्स परीक्षा 2026 में 487 अंक हासिल कर पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली छोटी कुमारी आज आर्थिक तंगी के कारण अपनी आगे की पढ़ाई शुरू नहीं कर पा रही हैं। परिणाम घोषित होने के बाद उन्हें सम्मान, बधाइयों और पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने के कई वादे मिले थे। प्रशासन ने भी हरसंभव सरकारी सहयोग का भरोसा दिलाया था, लेकिन करीब दो महीने बाद हालात ऐसे हैं कि राज्य की मेधावी छात्रा 16 हजार रुपये की हॉस्टल फीस नहीं जुटा पाने के कारण नियमित रूप से कॉलेज नहीं जा पा रही है।
बोकारो जिले के कसमार प्रखंड के खैराचातर गांव की रहने वाली छोटी कुमारी ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर पूरे झारखंड में पहला स्थान हासिल किया था। उनकी सफलता ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे गांव का नाम रोशन किया। उस समय कई सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और लोगों ने उनकी पढ़ाई में आर्थिक सहयोग देने का आश्वासन दिया था। लेकिन समय बीतने के साथ अधिकांश वादे सिर्फ आश्वासन बनकर रह गए।
रांची महिला कॉलेज में हो चुका है नामांकन
छोटी कुमारी ने बताया कि उन्होंने रांची महिला कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। इसके बाद 10 जुलाई को कॉलेज जाकर ऑफलाइन प्रक्रिया पूरी की। आर्थिक परेशानियों के बावजूद परिवार ने किसी तरह इंतजाम कर 16 जुलाई को 1,650 रुपये की नामांकन फीस ऑनलाइन जमा की।
हालांकि अब सबसे बड़ी चुनौती कॉलेज के हॉस्टल में प्रवेश की है। कॉलेज में नियमित पढ़ाई करने के लिए हॉस्टल में रहना जरूरी है, लेकिन 16 हजार रुपये वार्षिक हॉस्टल शुल्क जमा नहीं होने के कारण उन्हें अब तक हॉस्टल आवंटित नहीं किया गया है। कॉलेज प्रशासन के अनुसार हॉस्टल शुल्क जमा करने और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही उन्हें रहने की अनुमति मिल सकेगी।
हर महीने का खर्च भी बड़ी चुनौती
हॉस्टल शुल्क के अलावा छोटी कुमारी के सामने हर महीने करीब 2 हजार रुपये मेस शुल्क, किताबें, कॉपियां और अन्य शैक्षणिक खर्च भी बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि इन खर्चों का आसानी से वहन किया जा सके। छोटी का कहना है कि उन्होंने मेहनत से पढ़ाई कर राज्य में पहला स्थान हासिल किया, लेकिन अब आर्थिक तंगी उनकी आगे की पढ़ाई में सबसे बड़ी बाधा बन गई है। उन्होंने कहा कि रिजल्ट आने के बाद कई लोगों ने उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। उन्हें डर है कि कहीं पैसों की कमी उनके आईएएस अधिकारी बनने के सपने को अधूरा न छोड़ दे।
मोटिया मजदूरी कर परिवार चला रहे पिता
छोटी कुमारी के पिता भवानीशंकर नायक मोटिया मजदूर हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उन्होंने बताया कि इंटरमीडिएट परीक्षा का परिणाम आने से पहले ही उनकी दूसरी बेटी की शादी तय हो चुकी थी। शादी में वर्षों की जमा-पूंजी खर्च हो गई, जिसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई। उन्होंने कहा कि बेटी की सफलता पर उन्हें गर्व है, लेकिन आर्थिक मजबूरी के कारण वह उसकी उच्च शिक्षा और हॉस्टल का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। परिणाम आने के बाद कई लोगों ने आर्थिक सहयोग का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक कोई सहायता नहीं मिली।
प्रशासन और समाज से उम्मीद
छोटी कुमारी की कहानी यह बताती है कि प्रतिभा केवल सफलता तक पहुंचने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक सहयोग भी उतना ही जरूरी होता है। राज्य की टॉपर होने के बावजूद यदि एक छात्रा केवल 16 हजार रुपये की हॉस्टल फीस के कारण अपनी पढ़ाई शुरू नहीं कर पा रही है, तो यह चिंता का विषय है। छोटी आज भी उम्मीद लगाए बैठी हैं कि सरकार, प्रशासन, सामाजिक संगठन या कोई मददगार आगे आएगा और उनकी शिक्षा में सहयोग करेगा। उनका कहना है कि यदि उन्हें पढ़ाई का अवसर मिला तो वह पूरी मेहनत से अपने आईएएस अधिकारी बनने के लक्ष्य को पूरा करेंगी और समाज के लिए प्रेरणा बनेंगी।






