पति को खोया, बेटे को खोया, लेकिन हौसला नहीं टूटा; 68 साल की रजनी त्रिपाठी ने ड्रैगन फ्रूट से लिखी सफलता की नई कहानी
ओडिशा के बरगढ़ जिले की महिला किसान बनीं मिसाल, सोशल मीडिया से सीखी खेती और आज कई राज्यों के किसानों को दे रही हैं प्रशिक्षण
मुनादी लाइव: कहते हैं कि जिंदगी इंसान की परीक्षा तब लेती है जब उसके पास हार मान लेने के सौ बहाने होते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर मुश्किल को चुनौती बनाकर अपनी पहचान गढ़ते हैं। ओडिशा के बरगढ़ जिले के अट्टाबीरा ब्लॉक स्थित सारंडा गांव की रहने वाली 68 वर्षीय रजनी रानी त्रिपाठी ऐसी ही एक प्रेरणादायक शख्सियत हैं।
आज रजनी त्रिपाठी ड्रैगन फ्रूट की सफल किसान, नर्सरी संचालक और कई किसानों की मार्गदर्शक हैं। लेकिन उनकी सफलता की कहानी संघर्ष, दर्द, साहस और आत्मविश्वास की लंबी यात्रा से होकर गुजरी है।
आठवीं पास लड़की से डॉक्टर की पत्नी बनने तक का सफर
रजनी रानी त्रिपाठी ने स्थानीय स्कूल से आठवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी। वर्ष 1978 में उनकी शादी एक डॉक्टर से हुई। शादी के बाद उन्होंने एक सामान्य गृहिणी की तरह अपने परिवार को संभाला और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने देखे। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। उनके पति लंबे समय तक गंभीर बीमारी से जूझते रहे। किडनी ट्रांसप्लांट जैसे महंगे इलाज के बावजूद आखिरकार 44 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। पति की मृत्यु ने परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से झकझोर दिया।
जब बेटे की मौत ने तोड़ दिए सारे सपने
पति के निधन के बाद रजनी ने अपने तीन बेटों की परवरिश की जिम्मेदारी अकेले संभाली। आर्थिक संकट के बीच उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा जारी रखी। लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा आघात तब मिला जब 29 वर्ष की उम्र में उनके बड़े बेटे का निधन हो गया। जिस बेटे के लिए उन्होंने अनगिनत सपने देखे थे, उसके अचानक चले जाने से उनका संसार जैसे बिखर गया। कई लोगों के लिए यह हार मान लेने का समय होता, लेकिन रजनी ने टूटने के बजाय खुद को संभाला। उन्होंने अपने बाकी दोनों बेटों की प्रोफेशनल शिक्षा पूरी करवाई। आज दोनों बेटे अच्छी निजी कंपनियों में कार्यरत हैं, शादीशुदा हैं और सुखद पारिवारिक जीवन जी रहे हैं।
टेरेस गार्डनिंग से शुरू हुई नई यात्रा
साल 2019 तक रजनी त्रिपाठी 68 वर्ष की हो चुकी थीं। बच्चों की जिम्मेदारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं और उनके पास समय था। उन्होंने अपने इस समय का उपयोग टेरेस गार्डनिंग में करना शुरू किया। रजनी सिर्फ अपने घर की छत पर ही नहीं बल्कि अपने दोनों बेटों के फ्लैट की बालकनी में भी फल, फूल और औषधीय पौधे उगाने लगीं। स्मार्टफोन उनके लिए नया शिक्षक बन गया। यूट्यूब और सोशल मीडिया के माध्यम से वे नए पौधों और आधुनिक बागवानी तकनीकों की जानकारी हासिल करने लगीं।
ड्रैगन फ्रूट से पहली मुलाकात और बदली जिंदगी
साल 2020 की शुरुआत में उनके बड़े बेटे इंडोनेशिया के बाली से ड्रैगन फ्रूट लेकर आए।रजनी ने पहली बार इस अनोखे फल को देखा और चखा। हालांकि स्वाद उन्हें बहुत आकर्षक नहीं लगा, लेकिन इसके स्वास्थ्य लाभों ने उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने इंटरनेट पर इसके बारे में विस्तार से पढ़ना शुरू किया। जल्द ही उन्हें पता चला कि ड्रैगन फ्रूट में कई विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, यह कई बीमारियों से बचाव में सहायक है और बाजार में इसकी अच्छी मांग भी है। यहीं से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।

धान के खेत को बनाया ड्रैगन फ्रूट फार्म
पश्चिमी ओडिशा को राज्य का धान कटोरा कहा जाता है। यहां धान की खेती परंपरागत रूप से किसानों की मुख्य आजीविका रही है। लेकिन रजनी ने अलग सोच दिखाई। उन्होंने अपनी 60 डेसिमल खाली पड़ी जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती करने का निर्णय लिया। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि इस फसल में अपेक्षाकृत कम देखभाल की जरूरत होती है और कुछ वर्षों में अच्छा उत्पादन मिलने लगता है। उन्होंने कर्नाटक से ‘मोरक्कन रेड’ नामक मीठी हाइब्रिड किस्म के लगभग 2000 पौधे खरीदे। लेकिन पौधारोपण के ठीक पहले कोविड-19 महामारी के कारण देशव्यापी लॉकडाउन लग गया और उनकी पूरी योजना लगभग छह महीने तक ठप पड़ गई। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
ऑर्गेनिक खेती और किसानों की मदद
आज रजनी त्रिपाठी का ड्रैगन फ्रूट फार्म पूरी तरह चर्चा में है। उनके खेत में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बेहद सीमित है। हाइब्रिड पौधों को छोड़कर अधिकांश खेती प्रक्रियाएं ऑर्गेनिक तरीके से की जाती हैं। वह सोशल मीडिया के जरिए सीधे ग्राहकों तक अपने फल पहुंचाती हैं, जिससे उन्हें बेहतर मूल्य मिलता है। इतना ही नहीं, झारखंड और छत्तीसगढ़ से आने वाले किसानों को ड्रैगन फ्रूट के पौधे भी उपलब्ध कराती हैं। वे किसानों को तकनीकी सलाह, खेती की जानकारी और आर्थिक संभावनाओं के बारे में मार्गदर्शन भी देती हैं।

किसानों के लिए बनीं प्रेरणा
रजनी का मानना है कि सिर्फ धान की खेती पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को वैकल्पिक और उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर भी बढ़ना चाहिए। इसी सोच के साथ वह लगातार स्थानीय किसानों को ड्रैगन फ्रूट की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका मानना है कि यदि किसान आधुनिक तकनीक और बाजार की जरूरतों को समझें तो कम जमीन से भी अच्छी आय अर्जित की जा सकती है।
मीडिया ने भी सराहा प्रयास
रजनी त्रिपाठी के प्रयासों की चर्चा अब गांव और जिले तक सीमित नहीं है। उनकी सफलता की कहानी को ‘द नंदीघोष टीवी’ और ‘ईटीवी भारत’ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है। व्यावसायिक खेती का कोई पूर्व अनुभव नहीं होने के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत, सीखने की ललक और परिवार के सहयोग से खुद को एक सफल प्रगतिशील किसान के रूप में स्थापित किया है।
संघर्ष से सफलता तक की मिसाल
68 वर्ष की उम्र में अधिकांश लोग आरामदायक जीवन की तलाश करते हैं, लेकिन रजनी त्रिपाठी ने साबित कर दिया कि सीखने और नया शुरू करने की कोई उम्र नहीं होती। पति की मौत, बेटे को खोने का दर्द, आर्थिक चुनौतियां और सामाजिक दबाव—इन सभी परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज उनका ड्रैगन फ्रूट फार्म सिर्फ खेती का केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुका है।
रजनी त्रिपाठी की कहानी यह संदेश देती है कि यदि इरादे मजबूत हों तो उम्र, परिस्थितियां और संसाधनों की कमी भी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।






