झारखंड की सियासत का कड़वा सच: सत्ता, सिस्टम और भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने कैसे रोका विकास?

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राज्य बना, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली
अस्तित्व में आते ही झारखंड सियासी अस्थिरता के जाल में फँस गया जो झारखंड के लिए काल हो गया। भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, अपराध और गरीबी तेजी से बढ़ती गयी। इसका मूल कारण रहा कि तत्कालीन बिहार की कार्यसंस्कृति को अधिकारियों ने हस्तांतरित कर दी। नेता अबोध थे फँसते चले गए। आज स्थिति बिहार से भी बदतर होती गयी।

एक भूखा इंसान या जानवर खाने पर जैसे टूट पड़ता है ठीक उसी तरह यहाँ के नेता (मूलवासी + आदिवासी) भी पैसे पर टूट पड़े। भूखे जानवर की तरह। इस भूख का भरपूर लाभ अधिकारियों, अभियंताओं और नेताओं से नजदीक हुए व्यापारियों ने उठाया। सबसे अधिक अगर किसी वर्ग ने इस राज्य को बर्बादी पर ढकेला तो वो थे तत्कालीन मंत्रियों ने सरकारी आप्त सचिवों ने। एक ऐसी परंपरा बना दी जिसमे राज्य के भलाई से ज़्यादा उनके मंत्री और उनका हित निहित था। इनके उत्पात और कार्यप्रणाली से तंग आकर तत्कालीन मुख्य सचिव V S Dubey जी ने आप्त सचिवों के कार्य क्षेत्र और अधिकार को लेकर एक आदेश निर्गत किया लेकिन मंत्री के करीबी होने के कारण इतने शक्तिशाली थे कि मुख्य सचिव का आदेश आज भी अलमीरा में धूल फाँक रहा है। इनके साथ भी वही भूख थी। एक BDO/ CO / JE स्तर के अधिकारी अचानक इतने ऊँचे स्तर पर चले गए कि टूट पड़े।

आप्त सचिव और अनौपचारिक सत्ता संरचना
नव सृजित राज्य में जो मंत्री बने उनमें अधिकांश बिहार विधानसभा में पिछले सीट पर बैठने वाले थे। जब झारखंड नया राज्य बना तब यहाँ मंत्री बन गये। नए होने के कारण जानकारी का भी अभाव था। चालक और चतुर BDO/CO स्तर के अधिकारी मंत्रियों को अपने मुट्ठी में कर लिए। मंत्री चूँकि ख़ुद बहुत जानकार नहीं थे उन्हें लगा कि BDO/CO/JE से जानकार तो कोई होता नहीं है। आज भी यही परिपाटी चली आ रही है। मंत्रियों को दो आप्त सचिव मिले। एक सरकारी होते हैं एक निजी। लगभग सरकारी आप्तसचिव ज़्यादा प्रभावशाली होते थे। मंत्री उनके प्रभाव में रहते हैं। आज अधिकांश काफ़ी धनवान हो गए। निजी आप्तसचिव भी होते थे लेकिन वो गेस्ट हाउस, रिम्स, अस्पताल , स्कूल, कॉलेज, स्टेशन, एयरपोर्ट, मंदिर दर्शन, कार्यकर्ता की सेवा में बिजी रहते हैं।

राजनीति–प्रशासन–व्यापार: एक खतरनाक गठजोड़
इसके अलावा महत्वपूर्ण कारक बने व्यापारी। सभी मंत्री के साथ कुछ व्यापारी भी जुड़ गए। शपथ मंत्रियों ने ली लेकिन ये व्यापारी बिना शपथ के मंत्री बन बैठे। यहाँ के मंत्रियों या नेताओं की सुख सुविधा का ख्याल रखना लगे। यहाँ तक कि विभाग के फाइल उनके व्यापारिक कार्यालयों से निपटाया जाने लगा। वो व्यापारी भी भूखे इंसान की तरह टूट पड़े। इन व्यापारियों में अधिकांश बाहरी थे। बाहरी में भी बिहारी या राजस्थानी। आज भी जारी है।

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सियासत की अपरिपक्वता और सिस्टम की पकड़
बिहार का सौभाग्य हुआ सरकार बदली, नीतीश जी जैसे दूरदर्शी नेता मुख्यमंत्री बन गए। सबकुछ तो नहीं बहुत कुछ बहुत हद तक बदल गया। अफ़सोस झारखंड में आज भी वही परंपरा कायम है। देश के किसी राज्य में अधिकारी और व्यापारी इतने शक्तिशाली नहीं होंगे। नीतीश जी के सामने कभी मुख्य सचिव को आगे पीछे घूमते देखे हैं ? कभी अखबार में देखे हैं कि मुख्य सचिव का फोटो भी छप जाता है? बहुत मुश्किल से दिख जाता होगा। वहाँ पहले भी और आज भी विधायकों और जनप्रतिनिधियों की एक मर्यादा रखी जाती है अधिकारियों के द्वारा। यहाँ तो मंत्री भी तलवे चाटते हैं अधिकारियों के। आप कभी सचिवालय चले जाइए, दिख जाएगा कैसे विधायक/सांसद/मंत्री अधिकारियों के खुशामद करते नजर आयेंगे। ये केवल आज नहीं बल्कि झारखंड गठन के काल से ही इस परंपरा की शुरुवात हो गयी। इसका मूल कारण है मंत्री के ऊपर Dy Collector मतलब BDO/CO/JE रैंक के अधिकारियों का अत्यधिक प्रभाव। एक BDO/CO/JE स्तर के अधिकारी के लिए IAS/IPS बहुत बड़ा पद होता है। वो अपने मंत्री को उसी स्तर के सोच में पहुँचा देते हैं।

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क्या सिर्फ ‘बाहरी’ जिम्मेदार हैं?
कुछ लोगो की आदत बन गई है भीतरी बाहरी करते रहो और ख़ुद लूटते रहो। युवा पीढ़ी को गुमराह करते रहो और माल बटोरते रहो। हर खातियानधारी नेता बाहरी भीतरी करता मिलेगा लेकिन कुर्सी मिलने के बाद ये स्थानीय, बिहारी, बंगाली, उत्तर प्रदेश कोई मुद्दा नहीं रह जाता है।

अगर केवल बाहरी दोषी हैं तो JPSC घोटाले के कितने अभियुक्त बाहरी हैं? JPSC के अध्यक्ष और सदस्य को नियुक्त करने वाला मुख्यमंत्री खातियानधारी, JPSC के अध्यक्ष और सदस्य खातियानधारी, घोटाले से नियुक्त अधिकारियों में भी अधिकांश खातियानधारी। दोषी सिर्फ़ बाहरी कैसे? राज्य बनने के बाद बहुत से खतियानधारी युवा अधिकारी बने, दरोगा बने। कौन है जो भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी नहीं लगा रहा है। आज राज्य के 80 % अंचल/प्रखंड/थाने में खतियानधारी अफसर हैं। कहाँ पर राम राज्य है। किस अंचल में बिना पैसा का दाखिल ख़ारिज होता है? किस थाने में अवैध खनिज का दोहन नहीं होता है?

अगर केवल बाहरी दोषी हैं तो मधु कोड़ा, एनोस एक्का, हरिनारायण राय, कमलेश सिंह, आलमगीर आलम, बंधु तिर्की, भानु प्रताप शाही आदि कहाँ के हैं? जापान के? कौन बाहरी नेता किसी घोटाले में जेल गया? इंदर सिंह नामधारी जी, सरयू राय जी, पी एन सिंह जी, रवींद्र पांडे जी, डॉ अजय कुमार जी, अरुण गोविल जी, रीता वर्मा जी, धीरेंद्र अग्रवाल जी, रागिनी सिंह जी आदि नेता तो जेल नहीं गए।

आज 81 विधायक में कितने विधायक ऐसे हैं जो खातियानधारी नहीं हैं? शायद केवल पाँच । सरयू राय जी, राज सिन्हा जी, अनूप सिंह जी, रागिनी सिंह जी और पूर्णिमा साहू मैडम को छोड़कर सभी विधायक खातियानधारी हैं फिर केवल बाहरी कैसे लूट रहा है? उसी तरह 14 लोकसभा सांसद में केवल निशिकांत दुबे जी और बी डी राम जी को छोड़कर सभी खातियानधारी हैं, फिर लूट कौन रहा है? ठीक उसी तरह वर्तमान में 5 राज्यसभा सांसद में केवल एक प्रदीप वर्मा खातियानधारी नहीं हैं तो लूट कौन रहा है? खतियानधारी न?

सिस्टम पर सवाल: जनसेवा बनाम शक्ति
ये एकलौता राज्य होगा जहाँ अधिकांश बड़े नेता सीधे सीधे व्यापार करते हैं, इनके देखा देखी ये एकलौता राज्य होगा जहाँ बड़े बड़े अधिकारी भी सीधे सीधे व्यापार करते हैं। जबकि नेतागीरी का उद्देश्य सेवा है और नौकरी का उद्देश्य सरकार के काम के एवज़ में वेतन लेना। नेतागीरी और नौकरी एक अलग उद्देश्य है तथा इन दोनों से व्यापार का दूर दूर तक नाता नहीं है।शुद्ध रूप से जो व्यापारी है वो एक बहुत अच्छा जनसेवक होता है। लेकिन दो तरह का काम करने वाला एक अच्छा सेवक हो इसको गारंटी नहीं है।

यहाँ अधिकांश बड़े IAS/IPS की पत्नी, साला, ससुर, ससुर, भाई, बहनोई व्यापार करते हैं। ये एक अजीब विडंबना है। व्यापार का मतलब है लाभ का सौदा। नौकरी लाभ का सौदा नहीं है। ये विशुद्ध रूप से एक ऐसा काम है जिसमे काम के एवज़ में काम के अनुसार मेहनताना प्रदान की जाती है। यहाँ हर IAS/IPS का एक करीबी होता है। सरकार किसी की भी रहे चलती इनकी चलेगी। सरकारें बदलती रहती हैं लेकिन अधिकारी नहीं। ऐसी परिस्थिति में सुशासन की कल्पना बेमानी है।

गिरता राजनीतिक स्तर और जनता की कीमत
झारखंड में राजनीति का स्तर लगातार गिरता चला गया। जिसका खामियाजा आज तक झारखंड की जनता भुगत रही है। इनके स्तर का लाभ लेकर बाहरी भी मलाई खा रहे हैं। तुम भी लूटो हम भी लूटते हैं। तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय। यहाँ अधिकांश खातियानधारी बड़े नेता व्यापार में लिप्त हैं तो कहाँ से मिलेगा नीतीश कुमार और नवीन पटनायक का सुशासन?

झारखंड में व्यापारियों की कई संस्थाएं हैं जो दिन रात जनसेवा में लग रहते हैं।लेकिन कभी देखे हैं अधिकारियों को सेवा करते हुए। क्यों करेंगे ? महाराज जो ठहरे।जो दिन रात जनसेवा में लगे रहते हैं। व्यापारियों की कई संस्थाएं हैं जो दिन रात जनसेवा में लग रहते हैं।लेकिन कभी देखे हैं अधिकारियों को सेवा करते हुए। क्यों करेंगे ? महाराज जो ठहरे।

जागो युवा जागो – बदलो झारखंड!

लेखक परिचय : हिमांशु कुमार पाठक – राजनीतिक रणनीतिकार

Note: यह लेखक के निजी विचार हैं, जिन्हें संपादकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुनादी लाइव इन विचारो की पुष्टि नहीं करता है.

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