रील्स और शॉर्ट्स की लत से बच्चों की पढ़ाई पर खतरा, लिखना और गणित समझना हो रहा मुश्किल
फिजियोलॉजिस्ट की चेतावनी: रील्स-शॉर्ट्स की लत से बच्चों की सोचने और सीखने की क्षमता हो रही कमजोर
नई दिल्ली: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में बच्चों का स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है। खासकर इंस्टाग्राम रील्स, फेसबुक वीडियो और यूट्यूब शॉर्ट्स की बढ़ती लोकप्रियता ने बच्चों की दिनचर्या और सीखने की क्षमता पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत बच्चों की एकाग्रता, लेखन क्षमता और गणितीय समझ को प्रभावित कर रही है। फिजियोलॉजिस्ट और शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, रील्स की लगातार स्क्रॉलिंग बच्चों के मस्तिष्क को तत्काल मनोरंजन और त्वरित प्रतिक्रिया का आदी बना रही है। इसका नतीजा यह है कि बच्चों का ध्यान लंबे समय तक किसी एक विषय पर केंद्रित नहीं रह पा रहा है।
लिखने की आदत हो रही कमजोर
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल स्क्रीन पर अधिक समय बिताने वाले बच्चे अब नोट्स लिखने, लंबे उत्तर तैयार करने और हस्तलेखन का अभ्यास करने से दूर होते जा रहे हैं। पहले जहां बच्चे घंटों लिखकर अभ्यास करते थे, वहीं अब अधिकतर जानकारी वीडियो के जरिए प्राप्त कर रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी हैंडराइटिंग, शब्दावली और विचारों को लिखित रूप में व्यक्त करने की क्षमता पर पड़ रहा है।
गणितीय समझ पर भी असर
फिजियोलॉजिस्ट के अनुसार गणित एक ऐसा विषय है जिसमें लगातार अभ्यास, तर्कशक्ति और समस्या समाधान की क्षमता की जरूरत होती है। लेकिन शॉर्ट वीडियो की आदत बच्चों के धैर्य को कम कर रही है। नतीजतन, वे लंबे समय तक किसी गणितीय प्रश्न पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और जटिल समस्याओं को हल करने में जल्द ही रुचि खो देते हैं।
कम हो रही है एकाग्रता
विशेषज्ञ बताते हैं कि रील्स और शॉर्ट्स का फॉर्मेट बेहद तेज गति वाला होता है। हर कुछ सेकंड में नया कंटेंट मिलने से मस्तिष्क लगातार उत्तेजित रहता है। इससे बच्चों में “शॉर्ट अटेंशन स्पैन” की समस्या बढ़ रही है। ऐसे बच्चे पढ़ाई, किताब पढ़ने या किसी रचनात्मक गतिविधि में लंबे समय तक ध्यान नहीं लगा पाते।
अभिभावकों को सतर्क रहने की जरूरत
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम पर निगरानी रखें और उन्हें पढ़ने, लिखने, खेलकूद तथा रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें। साथ ही परिवार में “नो मोबाइल टाइम” जैसी आदतें विकसित करने की भी सलाह दी गई है। उनका मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग जरूरी है, लेकिन अत्यधिक रील्स और शॉर्ट वीडियो बच्चों के मानसिक विकास और शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।




