झारखंड राज्यसभा चुनाव में नाथवाणी फैक्टर! क्रॉस वोटिंग रोकने को महागठबंधन का ‘मिशन 56’

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रांची: झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। दो सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में अब मुकाबला सिर्फ संख्या बल का नहीं, बल्कि रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन का भी बन गया है। भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी की एंट्री ने महागठबंधन की चिंता बढ़ा दी है, जिसके बाद गठबंधन के सभी घटक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने की कवायद में जुट गए हैं।

राज्यसभा चुनाव में झामुमो ने बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस की ओर से प्रणव झा मैदान में हैं। दूसरी तरफ भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवाणी चुनावी समीकरणों को चुनौती देते नजर आ रहे हैं।

कांग्रेस ने झोंकी पूरी ताकत
राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने शनिवार को रांची पहुंचकर कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा से मुलाकात की। वहीं प्रणव झा लगातार महागठबंधन के विधायकों से संपर्क साध रहे हैं और अपने पक्ष में मतदान सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस आलाकमान भी सक्रिय हो गया है। पार्टी के झारखंड प्रभारी के. राजू और चुनाव पर्यवेक्षक अजय शर्मा 14 जून को रांची पहुंचेंगे। 15 जून को महागठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है, जिसमें क्रॉस वोटिंग रोकने और सभी विधायकों की एकजुटता बनाए रखने को लेकर अंतिम रणनीति तैयार की जाएगी।

संख्या बल महागठबंधन के पक्ष में
राज्यसभा चुनाव के गणित पर नजर डालें तो एक सीट जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता है। इस हिसाब से झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत लगभग तय मानी जा रही है। दोनों सीटों पर जीत के लिए महागठबंधन को कुल 56 मतों की जरूरत है और गठबंधन के पास फिलहाल यही संख्या मौजूद है। झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक मिलाकर महागठबंधन के पास कुल 56 वोट हैं।

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यदि सभी विधायक पार्टी लाइन के अनुसार मतदान करते हैं तो दोनों सीटों पर महागठबंधन की जीत सुनिश्चित मानी जा रही है।

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नाथवाणी की चुनौती क्यों महत्वपूर्ण?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिमल नाथवाणी का चुनाव मैदान में बने रहना ही मुकाबले को दिलचस्प बना रहा है। भाजपा और एनडीए समर्थित नाथवाणी के पास फिलहाल लगभग 24 वोटों का समर्थन माना जा रहा है। जीत का आंकड़ा छूने के लिए उन्हें कम से कम चार अतिरिक्त मतों की आवश्यकता होगी।

यही वजह है कि महागठबंधन के रणनीतिकार किसी भी प्रकार की नाराजगी, असंतोष या क्रॉस वोटिंग की संभावना को लेकर सतर्क हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में राज्यसभा चुनावों के दौरान क्रॉस वोटिंग ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। झारखंड में भी इसी आशंका को देखते हुए कांग्रेस और झामुमो नेतृत्व अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है।

प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद बढ़ी चर्चा
हाल ही में परिमल नाथवाणी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है। राजनीतिक गलियारों में इसे राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि नाथवाणी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार मुलाकात बताया गया है, लेकिन विपक्षी खेमे में इसे लेकर चर्चा जारी है।

18 जून पर टिकी निगाहें
नामांकन की जांच और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब चुनावी मुकाबला तीन उम्मीदवारों के बीच सिमट गया है। ऐसे में 18 जून को होने वाला मतदान केवल राज्यसभा की दो सीटों का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि झारखंड की राजनीति में महागठबंधन की एकजुटता कितनी मजबूत है और नाथवाणी फैक्टर कितना असर डाल पाता है।

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