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गुमला में ‘संविधान हत्या दिवस’ पर याद किया गया आपातकाल का काला अध्याय, युवाओं ने लिया लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प

आपातकाल 1975

गुमला, झारखंड: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले अध्याय आपातकाल (Emergency) की 50वीं बरसी के अवसर पर गुमला में ‘संविधान हत्या दिवस’ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम न केवल एक राजनीतिक जागरूकता अभियान रहा, बल्कि युवाओं को लोकतंत्र की बुनियादी समझ और उसकी रक्षा के संकल्प से जोड़ने का सशक्त प्रयास भी था।

1975 की आपातकालीन त्रासदी को किया गया याद

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने 25 जून 1975 की उस भयावह रात को याद किया, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा देश पर आपातकाल थोप दिया गया था।
इस दौरान संविधान के मूल सिद्धांतों—स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, प्रेस की आज़ादी और न्यायपालिका की स्वायत्तता—को निर्ममता से कुचल दिया गया।

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वक्ताओं की मुख्य बातें:

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पूर्व विधायक और वनांचल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष श्री निर्मल बेसरा ने आपातकाल के व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया:

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“उस दौर में केवल जेलें नहीं भरी गईं, बल्कि विचारों को भी कैद किया गया। कांग्रेस ने न सिर्फ संविधान का गला घोंटा, बल्कि भारत की आत्मा को आघात पहुँचाया।”

प्रख्यात लोकतंत्र सेनानी भगवान साबू, सत्यनारायण प्रसाद और विनय लाल ने आपातकाल के दौरान अपनी गिरफ्तारी, मानसिक यातना और लोकतंत्र को बहाल करने के लिए चले संघर्ष की दास्तान साझा की। उन्होंने कहा कि उस समय का अत्याचार आज की पीढ़ी को यह सिखाता है कि लोकतंत्र को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

युवा पीढ़ी को किया गया प्रेरित

कार्यक्रम में गुमला के विभिन्न विद्यालयों से आए छात्र-छात्राओं को आपातकाल की सच्चाई से अवगत कराते हुए यह संकल्प दिलाया गया कि वे जीवन के हर चरण में संविधान की गरिमा और लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा करेंगे।

छात्रों ने “हम संविधान की रक्षा करेंगे” और “लोकतंत्र अमर रहे” जैसे नारों के साथ इस आयोजन को जीवंत कर दिया।

भाजपा का कांग्रेस पर सीधा हमला

प्रदेश कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी के संविधान बचाओ अभियान पर भाजपा ने तीखा हमला बोला। वक्ताओं ने कहा कि:

“विडंबना देखिए कि जिस कांग्रेस ने देश के संविधान की हत्या की, वही आज हाथ में संविधान लेकर लोकतंत्र बचाने का नाटक कर रही है। यह वैसा ही है जैसे चूहे की रखवाली बिल्ली करे।”

लोकतंत्र की चेतना का संकल्प

गुमला में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाने का अभियान है कि लोकतंत्र कितना मूल्यवान है और उसे बचाने के लिए सतत सजगता आवश्यक है।
संविधान हत्या दिवस जैसे आयोजन यह सुनिश्चित करते हैं कि इतिहास की भूलों को दोहराया न जाए और भारत एक सशक्त लोकतंत्र के रूप में निरंतर आगे बढ़ता रहे।

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