भारत खरीदेगा 114 राफेल! चीन के 5वीं पीढ़ी के फाइटर के बीच स्वदेशीकरण पर बड़ा दांव
3.25 लाख करोड़ के प्रस्ताव में 94 राफेल भारत में बनाने की योजना
स्वदेशी हथियारों और तकनीक के एकीकरण पर भी जोर
नई दिल्ली: भारत अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस प्रस्ताव ने भारत की रक्षा रणनीति और स्वदेशीकरण की नीति को एक साथ चर्चा के केंद्र में ला दिया है। खास बात यह है कि यह सिर्फ विदेशी लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा नहीं है, बल्कि प्रस्ताव में बड़े पैमाने पर भारत में राफेल के निर्माण और स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। फ्रांस ने अगस्त 2026 में 114 राफेल के लिए अपना तकनीकी और वाणिज्यिक प्रस्ताव भारत को सौंप दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक 94 विमान भारत में बनाए जाने हैं, जबकि शुरुआती विमान फ्रांस से सीधे उपलब्ध कराए जाएंगे।
चीन के 5वीं पीढ़ी के फाइटर के बीच भारत का बड़ा प्लान
भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती चीन की तेजी से बढ़ती हवाई ताकत है। चीन 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों की अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना के लिए आधुनिक और बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि राफेल को आम तौर पर 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान माना जाता है, लेकिन इसका आधुनिक एवियोनिक्स, AESA रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और लंबी दूरी के हथियारों के साथ संयोजन इसे भारतीय वायुसेना की मौजूदा क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी दे सकता है।सरकार ने फरवरी 2026 में 114 MRFA राफेल विमानों की खरीद के प्रस्ताव को प्रारंभिक मंजूरी यानी Acceptance of Necessity (AoN) दी थी। रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि इससे भारतीय वायुसेना की एयर डॉमिनेंस क्षमता और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को मजबूती मिलेगी।
सिर्फ खरीद नहीं, भारत में बनेगा राफेल
इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी खासियत इसका Make in India वाला हिस्सा है। फ्रांसीसी प्रस्ताव में 114 में से 94 राफेल भारत में बनाए जाने की बात सामने आई है। इसके लिए भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी का मॉडल तैयार किया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, Dassault Aviation भारतीय उद्योग के साथ मिलकर देश में राफेल की फाइनल असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। यह Dassault के लिए फ्रांस के बाहर राफेल की पहली फाइनल असेंबली लाइन हो सकती है। यानी भारत केवल तैयार विमान खरीदने के बजाय उसकी मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
स्वदेशी हथियारों को राफेल से जोड़ने की तैयारी
भारत की रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा है—स्वदेशी हथियारों का एकीकरण। प्रस्ताव में भारतीय हथियार प्रणालियों, खासकर Astra एयर-टू-एयर मिसाइल के विभिन्न संस्करणों को राफेल के साथ जोड़ने की संभावनाओं की जांच की जा रही है। इससे भविष्य में भारतीय हथियारों को विदेशी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ सकती है। यही वजह है कि मौजूदा बातचीत सिर्फ विमान की कीमत तक सीमित नहीं है। भारत तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय उत्पादन, स्वदेशी कंटेंट और भविष्य में भारतीय प्रणालियों के एकीकरण जैसे मुद्दों पर भी जोर दे रहा है।
स्वदेशी कंटेंट कितना होगा?
प्रस्तावित कार्यक्रम में स्वदेशीकरण का स्तर भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय वायुसेना ने भारत में बनने वाले 96 विमानों के लिए शुरुआती स्तर पर कम से कम 40 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट और बाद के बैचों में इसे 60 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग रखी है। इसका मतलब है कि समय के साथ राफेल निर्माण में भारतीय कंपनियों और घरेलू सप्लाई चेन की भूमिका बढ़ाने की कोशिश होगी। यही प्रक्रिया भारत के एयरोस्पेस सेक्टर को लंबी अवधि में मजबूत कर सकती है।
भारत की Rafale ताकत कितनी बढ़ेगी?
भारत के पास पहले से भारतीय वायुसेना के लिए 36 राफेल हैं। इसके अलावा भारतीय नौसेना के लिए 26 Rafale-M का अलग सौदा हो चुका है। प्रस्तावित 114 राफेल के बाद भारत के पास वायुसेना और नौसेना के लिए कुल राफेल विमानों की संख्या काफी बढ़ जाएगी। इससे भारत के लिए एक ही प्रमुख फाइटर प्लेटफॉर्म के आसपास प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, रखरखाव और हथियार एकीकरण का इकोसिस्टम विकसित करना आसान हो सकता है।
लेकिन चीन से मुकाबला सिर्फ राफेल से नहीं
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। राफेल खरीद चीन के 5वीं पीढ़ी के विमानों की सीधी बराबरी वाला कदम नहीं है। भारत की दीर्घकालिक रणनीति में Tejas Mk-2 और AMCA जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण हैं। राफेल को एक तरह से मौजूदा और निकट भविष्य की जरूरतों के बीच ब्रिज क्षमता के रूप में देखा जा सकता है, जबकि भारत अपनी अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को विकसित कर रहा है। यानी रणनीति दो स्तरों पर चल रही है—एक तरफ तत्काल लड़ाकू क्षमता को मजबूत करना और दूसरी तरफ लंबी अवधि में विदेशी निर्भरता कम करना।
असली दांव ‘स्वदेशीकरण’ का
भारत के लिए 114 राफेल का प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी सफलता सिर्फ विमानों की संख्या से नहीं मापी जाएगी। असली सवाल यह होगा कि भारत इस सौदे के जरिए कितनी तकनीक, कितनी उत्पादन क्षमता और कितनी घरेलू सप्लाई चेन तैयार कर पाता है।फ्रांस और भारत ने रक्षा क्षेत्र में सह-विकास और सह-उत्पादन बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। दोनों देशों ने लड़ाकू विमानों और विमान इंजनों के क्षेत्र में Make in India सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। इसलिए 114 राफेल का प्रस्ताव सिर्फ एक हथियार सौदा नहीं, बल्कि भारत के लिए लड़ाकू विमान निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा औद्योगिक और रणनीतिक प्रयोग भी है।







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