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‘लज्जा भंग’ और ‘बेबस महिला’ जैसे शब्दों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, रेप मामलों की सुनवाई के लिए जारी की नई गाइडलाइंस

Supreme Court Guidelines

यौन अपराध मामलों में संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल पर जोर, सभी अदालतों को निर्देश

नई दिल्ली: यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि रेप और अन्य यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों, अभियोजकों और अदालतों को “लज्जा भंग”, “बेबस महिला”, “इज्जत लुटना”, “चरित्रहीन”, “उत्तेजक कपड़े” जैसे रूढ़िवादी और पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले शब्दों के प्रयोग से बचना होगा। अदालत ने कहा कि ऐसी भाषा पीड़ित के सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप नहीं है।

देशभर की अदालतों में लागू होंगे दिशा-निर्देश
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए इन दिशानिर्देशों को देशभर की अदालतों में लागू करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी हाईकोर्ट, जिला अदालतें, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, राज्य न्यायिक अकादमियां और विधि विश्वविद्यालय इन मानकों का पालन करें तथा इन्हें न्यायिक प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाए।

पीड़िता नहीं, ‘सर्वाइवर’ और ‘पीड़ित’ जैसे सम्मानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए जो किसी व्यक्ति की गरिमा बनाए रखें। फैसलों और सुनवाई के दौरान ऐसी भाषा से बचना होगा जो पीड़ित के चरित्र, नैतिकता या सामाजिक स्थिति पर अनावश्यक टिप्पणी करती हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध का मामला किसी व्यक्ति की नैतिकता नहीं, बल्कि उसकी सहमति, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा होता है।

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रूढ़िवादी सोच से बचने के निर्देश
नई गाइडलाइंस में अदालतों को यह भी सलाह दी गई है कि वे किसी भी यौन अपराध मामले में ऐसे पूर्वाग्रहों या सामाजिक धारणाओं के आधार पर टिप्पणी न करें, जिनसे यह संकेत मिले कि पीड़ित के व्यवहार, कपड़ों, जीवनशैली या पूर्व संबंधों के कारण अपराध की गंभीरता कम हो जाती है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे “रेप मिथ्स” और लैंगिक रूढ़ियों का न्यायिक प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

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पुलिस और अभियोजन एजेंसियों को भी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि अभियोजन निदेशालयों और पुलिस अधिकारियों को भी इन दिशानिर्देशों से अवगत कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने, चार्जशीट तैयार करने और अदालत में प्रस्तुतिकरण के दौरान भी संवेदनशील और सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए।

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न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने की पहल
शीर्ष अदालत ने कहा कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य केवल शब्द बदलना नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था में संवेदनशीलता और सम्मान की संस्कृति विकसित करना है। इससे यौन अपराधों के पीड़ितों के साथ न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित होगा और अदालतों में एक समान मानक स्थापित किए जा सकेंगे।

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पीड़ितों के सम्मान और निष्पक्ष न्याय पर रहेगा फोकस
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया है कि यौन अपराध के मामलों में अदालतों की प्राथमिक जिम्मेदारी पीड़ित की गरिमा, निजता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ऐसी किसी भी टिप्पणी या भाषा से बचने को कहा गया है, जिससे पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात पहुंचे या उसके प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह को बढ़ावा मिले। अदालत ने कहा कि न्याय केवल निष्पक्ष फैसला देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़ित के साथ सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार सुनिश्चित करना भी न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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