टाटा ग्रुप में बढ़ी खींचतान! चंद्रशेखरन के कार्यकाल पर नोएल टाटा का विरोध, SP ग्रुप का ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव
जमशेदपुर/मुंबई: टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के पांच साल के नए कार्यकाल को लेकर टाटा ग्रुप के भीतर मतभेद सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। इसी बैठक में शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की ओर से ₹25,000 करोड़ के प्रस्ताव की चर्चा भी सामने आई है। टाटा ग्रुप के भीतर नेतृत्व, कंपनी की संरचना और भविष्य की रणनीति को लेकर खींचतान की खबरों ने कॉरपोरेट जगत का ध्यान खींचा है। टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए दोबारा चेयरमैन नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। हालांकि, यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव का विरोध किया। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि बोर्ड में वोटिंग के दौरान एक स्वतंत्र निदेशक के निर्णायक वोट के बाद प्रस्ताव पारित हुआ। ऐसे में चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस बोर्ड के बीच मतभेद चर्चा का विषय बन गए हैं।
टाटा संस को प्राइवेट रखने को लेकर नोएल टाटा का तर्क
इस पूरे विवाद का एक बड़ा मुद्दा टाटा संस का भविष्य और उसकी संभावित लिस्टिंग है। रिपोर्टों के अनुसार, नोएल टाटा का पक्ष है कि टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध यानी प्राइवेट कंपनी के रूप में बनाए रखना टाटा समूह के मौजूदा मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और समूह की विभिन्न कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल ट्रस्ट्स की परोपकारी और सामाजिक गतिविधियों के लिए किया जाता है। लिस्टिंग की स्थिति में कंपनी को सार्वजनिक बाजार के निवेशकों और नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप काम करना होगा। ऐसे में कंपनी की दीर्घकालिक रणनीति, निवेश और घाटे वाले कारोबार को लेकर फैसलों पर भी अलग तरह का दबाव पड़ सकता है। हालांकि, इन तर्कों को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित बोर्ड और शेयरधारकों के फैसलों तथा लागू नियामकीय प्रावधानों पर निर्भर करेगी।
RBI के फैसले से बढ़ा लिस्टिंग का दबाव
टाटा संस से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण मुद्दा RBI का नियामकीय दर्जा है। टाटा संस को भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कंपनी ने मार्च 2024 में अपना NBFC रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी दी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, RBI ने सितंबर 2026 में इस आवेदन को खारिज कर दिया और कंपनी को लागू नियामकीय नियमों का पालन करने को कहा। यही वजह है कि टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर चर्चा फिर तेज हुई है। लिस्टिंग का मुद्दा अब कंपनी के भविष्य के कॉरपोरेट ढांचे और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।
SP ग्रुप का ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम में शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की ओर से सामने आया कथित ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, नोएल टाटा ने बोर्ड के सामने SP ग्रुप के एक ऐसे विकल्प का प्रस्ताव रखा, जिसके जरिए टाटा संस को तत्काल लिस्टिंग की दिशा में ले जाए बिना उसके लिए लिक्विडिटी उपलब्ध कराने का रास्ता तलाशा जा सकता है। बताया जा रहा है कि इस विकल्प में शेयर बायबैक या टाटा संस में कुछ हिस्सेदारी की बिक्री जैसे रास्तों के जरिए SP ग्रुप को नकदी उपलब्ध कराने की संभावना शामिल है। हालांकि, प्रस्ताव की अंतिम संरचना, उसकी स्वीकार्यता और उस पर बोर्ड की आगे की कार्रवाई को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसलिए ₹25,000 करोड़ के प्रस्ताव को फिलहाल एक रिपोर्टेड विकल्प के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
चंद्रशेखरन के सामने अब बड़ी चुनौती
एन. चंद्रशेखरन ने जनवरी 2017 में टाटा संस की कमान संभाली थी। उनके नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने कई बड़े कारोबारी क्षेत्रों में विस्तार किया है। अब पांच साल के नए कार्यकाल के साथ उनके सामने समूह के अलग-अलग कारोबारों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ कॉरपोरेट गवर्नेंस, नियामकीय अनुपालन और टाटा ट्रस्ट्स के साथ समन्वय जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। वहीं, नोएल टाटा के विरोध के बाद सवाल यह है कि टाटा संस के बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच आगे किस तरह की सहमति बनती है।
क्या कानूनी विवाद तक पहुंचेगा मामला?
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब कानूनी और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े अधिकारों का है। रिपोर्टों में टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की भूमिका और टाटा संस के Articles of Association के प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यदि संबंधित पक्ष इस मामले को आगे कानूनी स्तर पर ले जाते हैं, तो कंपनी के बोर्ड अधिकारों, शेयरधारकों की भूमिका और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या महत्वपूर्ण हो सकती है। फिलहाल बोर्ड ने चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल को मंजूरी दे दी है, लेकिन नोएल टाटा का विरोध और SP ग्रुप के ₹25,000 करोड़ के प्रस्ताव की चर्चा टाटा संस के भविष्य को लेकर बहस को और महत्वपूर्ण बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस बोर्ड और अन्य संबंधित पक्ष इस विवाद को किस तरह आगे बढ़ाते हैं और कंपनी की लिस्टिंग तथा भविष्य की पूंजी संरचना को लेकर क्या रास्ता निकलता है।
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