MMDR संशोधन के खिलाफ झामुमो का उलगुलान तेज, विनोद पांडेय बोले- झारखंड के अधिकारों से समझौता नहीं

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रांची: झारखंड में माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) संशोधन कानून, 2026 (MMDR Amendment Act) को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने कानून के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन को और व्यापक करने का ऐलान किया है। झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने कहा कि प्रखंड मुख्यालयों से शुरू हुआ पार्टी का विरोध अब जिला मुख्यालयों और इसके बाद राज्य स्तर तक ले जाया जाएगा।

विनोद पांडेय ने कहा कि झामुमो का आंदोलन झारखंड के जल, जंगल, जमीन और खनिज संसाधनों से जुड़े अधिकारों के सवाल पर है। उनके मुताबिक पार्टी का मानना है कि नया कानून खनिज संपदा वाले राज्यों के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। 19 सितंबर को झामुमो ने राज्यभर के प्रखंड मुख्यालयों पर प्रदर्शन किया था और पार्टी के मुताबिक करीब 260 प्रखंड मुख्यालयों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए।

‘खनिज राजस्व और राज्यों के अधिकार का सवाल’
झामुमो महासचिव ने आरोप लगाया कि MMDR संशोधन कानून केवल खनिज राजस्व का मामला नहीं है, बल्कि इसका संबंध राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय ढांचे से भी है। उन्होंने कहा कि खनिज उत्पादन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन और सामाजिक लागत का बड़ा हिस्सा झारखंड जैसे राज्यों को उठाना पड़ता है। विनोद पांडेय के अनुसार, ऐसे में खनिज संसाधनों से जुड़े राजस्व और नीतिगत अधिकारों पर राज्य की भूमिका को कमजोर करने वाली किसी भी व्यवस्था का पार्टी विरोध करेगी।

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हालांकि, इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की स्थिति अलग है। केंद्रीय खान मंत्रालय ने कहा है कि MMDR संशोधन से राज्यों के भूमि और खनिज अधिकार समाप्त नहीं होते तथा खनन से जुड़े कुल करों और वैधानिक भुगतानों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है और यह व्यवस्था जारी रहेगी। केंद्र ने यह भी कहा है कि राज्यों के लघु खनिजों पर नियमन और कर लगाने की शक्तियां प्रभावित नहीं होंगी।

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₹1.36 लाख करोड़ के बकाये का मुद्दा भी उठाया
विनोद पांडेय ने झारखंड के लंबे समय से चले आ रहे करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाये का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने जिस राशि का हिसाब मांगा था, अब भाजपा को भी इस बकाये के संबंध में जवाब देना चाहिए। झारखंड सरकार लंबे समय से केंद्र और केंद्रीय उपक्रमों से जुड़े विभिन्न मदों में इस राशि के भुगतान की मांग करती रही है। उपलब्ध सरकारी दावों और रिपोर्टों के अनुसार इसमें करीब ₹1,01,142 करोड़ भूमि मुआवजा, करीब ₹32,000 करोड़ Common Cause से संबंधित दावे और करीब ₹2,500 करोड़ कोयला रॉयल्टी शामिल हैं।

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कानून में राज्यों की लेवी पर क्या बदला?
MMDR संशोधन कानून को लेकर विवाद का एक प्रमुख बिंदु खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले कुछ टैक्स, सेस या अन्य लेवी से जुड़ा है। PRS के विश्लेषण के मुताबिक संशोधन में राज्यों को निर्धारित परिस्थितियों और केंद्र द्वारा तय प्रतिबंधों के अधीन ऐसी कुछ लेवी लगाने से रोका गया है। साथ ही, कानून लागू होने से पहले की कुछ ऐसी अवैतनिक या वसूल न की गई लेवी को भी अमान्य माने जाने का प्रावधान है। यही प्रावधान झारखंड जैसे खनिज उत्पादक राज्यों में राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।

अब जिला मुख्यालयों पर आंदोलन की तैयारी
विनोद पांडेय ने कहा कि प्रखंड मुख्यालयों पर हुआ प्रदर्शन आंदोलन का पहला चरण था। अब झामुमो जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन करेगा और इसके बाद राज्य स्तर पर बड़ा आंदोलन आयोजित करने की तैयारी है। उन्होंने कहा कि पार्टी इस मुद्दे को केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि संवैधानिक और कानूनी मंचों पर भी उठाएगी। उनके मुताबिक झारखंड सरकार भी कानून को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रही है और जरूरत पड़ने पर न्यायिक रास्ता अपनाने की तैयारी में है।

जल-जंगल-जमीन और खनिज पर अधिकार’ को बनाया आंदोलन का मुद्दा
झामुमो ने इस पूरे अभियान को केवल खनिज राजस्व का विवाद नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार से जोड़ दिया है। विनोद पांडेय ने कहा कि झामुमो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य के अधिकारों की लड़ाई जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि खनन से होने वाले प्रदूषण, विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभावों का सामना झारखंड के लोगों को करना पड़ता है। इसलिए खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर राज्य के हितों की रक्षा जरूरी है। झामुमो नेता ने कहा कि पार्टी का आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक केंद्र सरकार उन प्रावधानों पर पुनर्विचार नहीं करती, जिन्हें झामुमो झारखंड के हितों के प्रतिकूल मानता है।

इस बीच, केंद्र सरकार MMDR संशोधन को खनिज क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता, निवेश और स्पष्ट वित्तीय व्यवस्था लाने वाला कदम बता रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में कानून के प्रावधानों, राज्यों के अधिकारों और खनिज राजस्व को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार के बीच राजनीतिक तथा कानूनी बहस और तेज होने की संभावना है।

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