CAG का महाखुलासा! झारखंड में ₹1.60 लाख करोड़ का हिसाब गायब, PMAY में लाखों गरीब परिवारों को झटका
परिवहन विभाग में ₹415.89 करोड़ का वित्तीय निहितार्थ
305 नाबालिगों को ड्राइविंग लाइसेंस!
6,640 वाहन बिना स्थायी पंजीकरण
₹31,110 करोड़ बजट में खर्च ही नहीं हुआ

रांची: झारखंड विधानसभा के मॉनसून सत्र में पेश CAG की रिपोर्ट ने राज्य की वित्तीय व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिनका जवाब सरकार को देना होगा। एक तरफ सरकारी खजाने से खर्च हुई ₹1.60 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि के 52,855 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित हैं, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण में 6.32 लाख योग्य परिवार योजना के दायरे से बाहर रह गए।
यहीं मामला खत्म नहीं होता। परिवहन विभाग की ऑडिट में ₹415.89 करोड़ का वित्तीय निहितार्थ सामने आया। लर्निंग लाइसेंस के नाम पर कथित अवैध वसूली, नाबालिगों को ड्राइविंग लाइसेंस, हजारों वाहनों का अधूरा पंजीकरण, टैक्स वसूली में लापरवाही और करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का भी उल्लेख रिपोर्ट में है। अब सवाल सिर्फ गड़बड़ी का नहीं है… सवाल है कि सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही आखिर किसकी है?

₹1.60 लाख करोड़ के खर्च का हिसाब कहां है?
CAG रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक ₹1,60,565.80 करोड़ की राशि से जुड़े 52,855 उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रधान महालेखाकार को उपलब्ध नहीं कराए गए। सरकारी नियमों के मुताबिक जिस उद्देश्य के लिए पैसा जारी किया जाता है, उसके खर्च का उपयोगिता प्रमाण देना जरूरी है। लेकिन इतनी बड़ी राशि से जुड़े प्रमाण पत्र लंबित रहने से यह सवाल उठता है कि सरकारी पैसा किस काम में और कितना खर्च हुआ? साथ ही 17,877 AC Bills के विरुद्ध ₹4,531 करोड़ के DC Bills भी जमा नहीं किए गए। यह सीधे तौर पर वित्तीय निगरानी और जवाबदेही से जुड़ा सवाल है।
गरीबों के घर की योजना में 6.32 लाख परिवार बाहर!
अब आते हैं प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण पर। CAG की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 से नवंबर 2022 के बीच झारखंड में 22.34 लाख योग्य परिवारों की सूची तैयार की गई। लेकिन लाभुकों की सूची को अंतिम रूप देने में करीब दो साल की देरी हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि केंद्र सरकार ने 22.34 लाख योग्य परिवारों के मुकाबले सिर्फ 16.02 लाख आवास ही आवंटित किए। यानी 6.32 लाख योग्य परिवार, करीब 28 प्रतिशत पात्र परिवार, योजना के दायरे से बाहर रह गए। सवाल है—जिन गरीब परिवारों को पक्के घर की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उनकी सूची तैयार करने में इतनी बड़ी देरी क्यों हुई? और 2.90 लाख अपात्र लोग सूची में कैसे पहुंचे?
CAG ने PMAY-G में लाभुकों के चयन पर भी सवाल उठाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 2.90 लाख अपात्र लोगों को योजना की सूची में शामिल कर लिया गया था। बाद में ग्राम सभाओं ने ऐसे लोगों को सूची से हटा दिया। लेकिन सवाल फिर वही—अगर पात्रता के स्पष्ट मानक मौजूद थे, तो इतनी बड़ी संख्या में अपात्र लोगों के नाम सूची में पहुंचे कैसे? CAG ने बोकारो, दुमका, गिरिडीह, पलामू, रामगढ़ और सिमडेगा के 12 प्रखंडों की 60 पंचायतों में नमूना जांच की। रिपोर्ट में कहा गया कि इन 60 पंचायतों में स्थायी प्रतीक्षा सूची से संबंधित दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं थे।

घर बनने में तीन साल, जबकि लक्ष्य था एक साल
PMAY-G में आवास निर्माण की स्थिति पूरी तरह खराब नहीं रही। केंद्र से आवंटित 16.02 लाख आवासों में से राज्य ने 15.92 लाख आवासों को मंजूरी दी और जनवरी 2025 तक 15.62 लाख आवास पूरे किए गए। यानी स्वीकृत आवासों के निर्माण में उपलब्धि करीब 98 प्रतिशत रही। लेकिन समस्या निर्माण की गति में भी रही। जिन घरों को एक वर्ष में पूरा किया जाना था, उन्हें पूरा करने में कुछ मामलों में तीन साल तक लग गए।

परिवहन विभाग में ₹415.89 करोड़ का वित्तीय निहितार्थ
अब परिवहन विभाग की ओर रुख करते हैं। अगस्त 2024 से मार्च 2025 के बीच हुई ऑडिट में 2019-20 से 2023-24 की अवधि से जुड़े मामलों में ₹415.89 करोड़ का वित्तीय निहितार्थ सामने आया। इसके अलावा 2023-24 में दूसरे कार्यालयों में ₹96.67 करोड़ के मामले भी सामने आए।

सबसे चौंकाने वाला मामला लर्निंग लाइसेंस से जुड़ा है।
CAG के अनुसार 2017 से 2024 के बीच वेंडर्स ने आवेदकों से कथित तौर पर ₹4.09 करोड़ की अतिरिक्त वसूली की। जबकि वेंडर्स को केवल प्रिंटिंग का काम करना था।
305 नाबालिगों को ड्राइविंग लाइसेंस!
रिपोर्ट के मुताबिक सारथी पोर्टल की तकनीकी कमियों के कारण 2019 से 2024 के बीच पांच जिलों में 18 साल से कम उम्र के 305 नाबालिगों को गियर वाली मोटरसाइकिल का लाइसेंस जारी हो गया। यह सिर्फ तकनीकी खामी नहीं… यह सड़क सुरक्षा का सवाल है। जब कानून उम्र तय करता है, तो सिस्टम की कमी के कारण नाबालिगों तक ड्राइविंग लाइसेंस कैसे पहुंच गया?
6,640 वाहन बिना स्थायी पंजीकरण
CAG ने पाया कि 2019-24 के दौरान 6,640 वाहनों का अस्थायी पंजीकरण हुआ, लेकिन स्थायी पंजीकरण नहीं कराया गया। वहीं समाप्त हो चुके फिटनेस प्रमाणपत्र वाले 4,458 वाहन सड़कों पर चलते पाए गए, जिससे ₹7.58 करोड़ के नुकसान का उल्लेख रिपोर्ट में है। Tata Motors से जुड़े TR के मामले में 2021-24 के दौरान ₹327.35 करोड़ के कम संग्रहण की बात भी CAG ने कही है।
टैक्स वसूली में भी बड़ी चूक
13 जिला परिवहन कार्यालयों की नमूना जांच में 6,925 वाहन मालिकों से ₹62.93 करोड़ का मोटर वाहन कर और जुर्माना वसूल नहीं किया गया। 693 ओवरलोड वाहनों से जुड़े मामलों में ₹2.69 करोड़ का जुर्माना नहीं वसूला गया। वहीं HDFC बैंक POS मशीनों से संग्रहित ₹47.21 करोड़ सरकारी खाते में 2 से 8 महीने की देरी से जमा हुआ। CAG के अनुसार इस पर ₹1.23 करोड़ का दंडात्मक ब्याज बनता था।
₹31,110 करोड़ बजट में खर्च ही नहीं हुआ
वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य के ₹1,50,938.84 करोड़ के कुल बजट में से ₹31,110 करोड़, यानी 20.61 प्रतिशत राशि खर्च ही नहीं हो सकी। 46 मामलों में ₹5,407 करोड़ के अनुपूरक प्रावधान भी अनावश्यक पाए गए, क्योंकि वास्तविक खर्च मूल बजट प्रावधान तक नहीं पहुंचा। वहीं मार्च 2025 तक पुराने वित्तीय वर्षों के ₹4,046.43 करोड़ के अतिरिक्त व्यय का नियमितीकरण लंबित था।
श्रम उपकर में ₹471.93 करोड़ बकाया
मार्च 2025 तक श्रम उपकर की कुल राशि ₹945.67 करोड़ थी। इसमें से पिछले तीन वर्षों में केवल ₹473.74 करोड़ ही हस्तांतरित किए गए। यानी BOCW कल्याण बोर्ड को हस्तांतरित की जाने वाली ₹471.93 करोड़ की राशि बकाया रही।
अब सबसे बड़ा सवाल—सरकार जवाब देगी?
CAG की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े अलग-अलग विभागों की अलग-अलग कहानियां नहीं हैं। ये सवाल सरकारी पैसे के इस्तेमाल, योजनाओं के लाभुक चयन, राजस्व वसूली और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े हैं। एक तरफ गरीबों के लिए घर की योजना में लाखों पात्र परिवार छूट जाते हैं, दूसरी तरफ अपात्र लोगों के नाम सूची में पहुंच जाते हैं। परिवहन विभाग में नाबालिगों को लाइसेंस मिल जाता है, हजारों वाहन बिना फिटनेस दौड़ते हैं और करोड़ों रुपये का टैक्स वसूल नहीं हो पाता। एक तरफ गरीबों के लिए घर की योजना में लाखों पात्र परिवार छूट जाते हैं, दूसरी तरफ अपात्र लोगों के नाम सूची में पहुंच जाते हैं। परिवहन विभाग में नाबालिगों को लाइसेंस मिल जाता है, हजारों वाहन बिना फिटनेस दौड़ते हैं और करोड़ों रुपये का टैक्स वसूल नहीं हो पाता।और सबसे ऊपर—₹1.60 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित हैं।
CAG ने सुधार के लिए कई सिफारिशें दी हैं—वेंडर्स की जांच, ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्टिंग सेंटर, वे-ब्रिज, टैक्स वसूली की निगरानी और लंबित UC-DC Bills को जल्द जमा कराने की व्यवस्था। लेकिन असली सवाल यही है— क्या सिर्फ CAG की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने से व्यवस्था सुधर जाएगी? या सरकार अब जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई भी करेगी? क्योंकि जनता का पैसा सिर्फ बजट की किताब में दर्ज आंकड़ा नहीं है… यह जनता की मेहनत की कमाई है और उसका हिसाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।






