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राजदंड से तकनीक तक: अहिल्याबाई की विरासत में दिखती है आज की नारी शक्ति की नई तस्वीर

Maharani Ahilyabai Holkar

विशेष लेख डॉ. आर. एच. लता: आज जब महिला सशक्तिकरण की बात होती है तो चर्चा शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, समान अवसर और नेतृत्व की होती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बीते दशकों में भारतीय महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है। लेकिन भारतीय नारी शक्ति की कहानी केवल आधुनिक उपलब्धियों से शुरू नहीं होती। इसकी जड़ें उस परंपरा में हैं, जहां महिलाओं ने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच भी समाज को दिशा दी। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर इसका सबसे सशक्त उदाहरण हैं। 13 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनका जीवन आज के महिला सशक्तिकरण की अवधारणा को एक अलग दृष्टि देता है। उन्होंने ऐसे समय में नेतृत्व संभाला, जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन और सत्ता के क्षेत्र में अवसर बेहद सीमित थे। फिर भी उन्होंने अपने आत्मविश्वास, विवेक, प्रशासनिक क्षमता और लोकसेवा के माध्यम से ऐसी पहचान बनाई, जो समय की सीमाओं से परे है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने शक्ति को कभी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं बनाया। उनके लिए सत्ता का अर्थ था—जनसेवा। व्यक्तिगत जीवन में आए अनेक दुखों के बावजूद उन्होंने स्वयं को परिस्थितियों के हवाले नहीं किया। उन्होंने अपने दुःख को समाज के लिए काम करने की ऊर्जा में बदला। यही वह बिंदु है, जहां आज की नारी और अहिल्याबाई के युग की नारी के बीच एक गहरा संबंध दिखाई देता है।


लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं, कुओं और जनसुविधाओं के निर्माण एवं संरक्षण में योगदान दिया। देश के विभिन्न तीर्थस्थलों के विकास और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में उनकी भूमिका आज भी स्मरण की जाती है। उनके लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं था। धर्म उनके लिए कर्तव्य था, न्याय था और लोककल्याण था। यही कारण है कि उनका शासन केवल प्रशासनिक व्यवस्था का उदाहरण नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व का भी उदाहरण माना जाता है। आज जब नेतृत्व को लेकर महिलाओं के लिए नए अवसर खुले हैं, तब लोकमाता देवी अहिल्याबाई का जीवन यह संदेश देता है कि नेतृत्व केवल पद हासिल करने का नाम नहीं है। नेतृत्व की असली पहचान यह है कि उस पद और शक्ति का इस्तेमाल किसके लिए किया जा रहा है।

आज की महिला के पास अवसर ज्यादा, चुनौतियां भी नई
आज की भारतीय महिला के सामने वे सीमाएं नहीं हैं, जो सदियों पहले थीं। वह डॉक्टर बन रही है, वैज्ञानिक बन रही है, सेना में जा रही है, उद्योग चला रही है, प्रशासन संभाल रही है, राजनीति में नेतृत्व कर रही है और खेल के मैदान में देश का नाम रोशन कर रही है। शिक्षा और तकनीक ने महिलाओं के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत किया है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी ने उन्हें अपनी आवाज रखने का मंच दिया है। फिर भी सवाल यह है कि क्या केवल अवसर मिल जाना ही सशक्तिकरण है? शायद नहीं। सशक्तिकरण तब पूरा होता है, जब महिला अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। जब स्वतंत्रता के साथ अनुशासन हो, सफलता के साथ संवेदनशीलता हो और नेतृत्व के साथ सेवा की भावना हो। यहीं लोकमाता देवी अहिल्याबाई आज की महिला से जुड़ती हैं।

अधिकार जरूरी लेकिन उत्तरदायित्व भी उतना ही
आज महिला अपने अधिकारों के प्रति पहले से अधिक जागरूक है। यह सामाजिक परिवर्तन की सकारात्मक दिशा है। लेकिन भारतीय नारी शक्ति की परंपरा अधिकारों से आगे की बात करती है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई का जीवन बताता है कि अधिकार शक्ति देते हैं, लेकिन उत्तरदायित्व उस शक्ति को सार्थक बनाता है। महिला शिक्षित हो, लेकिन उसकी शिक्षा केवल उसकी व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहे। वह आत्मनिर्भर बने, लेकिन अपनी सफलता से दूसरी महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा करे। वह नेतृत्व करे, लेकिन नेतृत्व को सेवा का माध्यम बनाए। यही वह सोच है, जो नारी सशक्तिकरण को व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक ले जाती है।

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योगिनी… केवल योग करने वाली महिला नहीं
इसी संदर्भ में “योगिनी” शब्द का अर्थ भी व्यापक हो जाता है। भारतीय योगिनी संघ की अवधारणा में योगिनी केवल योग का अभ्यास करने वाली महिला नहीं है। वह ऐसी नारी है, जो अपने भीतर की शक्ति को पहचानती है और उसे सकारात्मक दिशा देती है। वह अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग है, ज्ञान अर्जित करती है, आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करती है, परिवार को मजबूत करती है, समाज के प्रति जिम्मेदारी समझती है और आवश्यकता पड़ने पर नेतृत्व भी करती है। इस दृष्टि से देखें तो लोकमाता देवी अहिल्याबाई अपने समय की एक महान योगिनी थीं। उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय आत्मबल को अपना आधार बनाया। उन्होंने अपनी शक्ति को समाज के लिए इस्तेमाल किया और अपने शासन को लोककल्याण से जोड़ा। आज की योगिनी के पास राजदंड नहीं है, लेकिन उसके पास उससे भी बड़ी शक्ति है—ज्ञान, शिक्षा, कौशल, तकनीक और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता।

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समय बदला, भूमिका बदली… लक्ष्य नहीं
अहिल्याबाई के हाथों में राजदंड था, आज की महिला के हाथों में कलम, कंप्यूटर, व्यवसाय, विज्ञान, प्रशासन और सामाजिक नेतृत्व की शक्ति है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने प्रजा का नेतृत्व किया, आज की महिला संस्थाओं, समुदायों और सामाजिक अभियानों का नेतृत्व कर रही है। उन्होंने जनकल्याण को शासन का आधार बनाया, आज की महिला स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला उद्यमिता, पर्यावरण, योग और सामाजिक सेवा के माध्यम से समाज में बदलाव ला सकती है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति और विरासत के संरक्षण में योगदान दिया, आज की योगिनी के सामने जिम्मेदारी है कि वह आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत बनाए। इसलिए यह यात्रा केवल अतीत से वर्तमान तक की यात्रा नहीं है। यह परंपरा से आधुनिकता तक और अधिकार से उत्तरदायित्व तक की यात्रा भी है।

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21वीं सदी की योगिनी कैसी हो
आज भारत को ऐसी महिला की जरूरत है, जो आधुनिक सोच रखती हो, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो तकनीक का इस्तेमाल करना जानती हो, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को न भूले। जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, लेकिन परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी को भी समझे। जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए, लेकिन दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी करे। जो नेतृत्व चाहती हो, लेकिन नेतृत्व को प्रतिष्ठा नहीं, सेवा समझे। और सबसे महत्वपूर्ण, जो खुद आगे बढ़ने के साथ दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने का अवसर दे।
क्योंकि किसी एक महिला की सफलता उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है, लेकिन एक महिला द्वारा दूसरी महिलाओं के लिए रास्ता तैयार करना सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है। जब नारी शक्ति बनेगी, तभी राष्ट्र शक्ति मजबूत होगी। भारतीय परंपरा ने नारी को शक्ति कहा है। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि महिला में सामर्थ्य है। इसका अर्थ यह भी है कि उसके भीतर सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की क्षमता है। एक शिक्षित महिला परिवार को शिक्षित करती है। एक आत्मनिर्भर महिला परिवार को आर्थिक मजबूती देती है। एक जागरूक महिला बच्चों की सोच को प्रभावित करती है। एक नेतृत्वकर्ता महिला समाज में नई दिशा पैदा करती है। ऐसी करोड़ों महिलाओं की सामूहिक शक्ति ही आगे चलकर राष्ट्र शक्ति बनती है।इसलिए नारी सशक्तिकरण को केवल महिलाओं के हित का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। यह देश के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा विषय है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई का जीवन आज की महिला से एक सवाल करता है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए शायद सबसे जरूरी सवाल यही है, हम अपनी शक्ति का इस्तेमाल किसलिए कर रहे हैं। क्या हमारी शिक्षा केवल हमारे अपने विकास के लिए है।क्या हमारी सफलता किसी दूसरी महिला के लिए भी रास्ता खोल रही है। क्या हमारा नेतृत्व समाज के काम आ रहा है। क्या हमारी आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी बढ़ रही है। यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तो यही अहिल्याबाई की विरासत को आगे बढ़ाने का सबसे बेहतर तरीका है।

अब बारी आज की योगिनी की
लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने अपने समय की सीमाओं को चुनौती देकर यह साबित किया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति रखने वाली महिला बदलाव की शुरुआत कर सकती है। आज की महिला के पास अवसर भी हैं और संसाधन भी। जरूरत केवल इस बात की है कि वह अपनी शक्ति को सही दिशा दे।
अपने लिए सफल बने, लेकिन दूसरों के लिए भी अवसर बनाए। अपने अधिकारों के प्रति सजग रहे, लेकिन कर्तव्यों को भी याद रखे। आधुनिक बने, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। नेतृत्व करे, लेकिन सेवा की भावना के साथ। यही लोकमाता देवी अहिल्याबाई से आज की योगिनी तक की असली यात्रा है। यह यात्रा किसी एक महिला की कहानी नहीं है। यह भारत की उन करोड़ों महिलाओं की कहानी है, जो अपने परिवार, समाज और देश को बेहतर बनाने में प्रतिदिन अपनी भूमिका निभा रही हैं।
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने समय में जिस नारी शक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया था, आज उसी शक्ति को नई शिक्षा, नए अवसर और नई सोच के साथ आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।

लेखक परिचय : डॉ. आर. एच. लता, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय योगिनी महासंघ

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