‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ टिप्पणी पर प्रियंका गांधी घिरीं, IIT मद्रास निदेशक के समर्थन में तेज हुई ऑनलाइन मुहिम
नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से लोकसभा में IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटी की ओर इशारा करते हुए इस्तेमाल किए गए ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ शब्द को लेकर विवाद थमने के बजाय बढ़ता जा रहा है। अब शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के एक वर्ग ने इस टिप्पणी के खिलाफ ऑनलाइन अभियान शुरू किया है। Change.org पर 1 अगस्त 2026 को शुरू की गई याचिका में लोकसभा अध्यक्ष से मामले का संज्ञान लेने और प्रियंका गांधी से टिप्पणी वापस लेकर खेद जताने की मांग की गई है। 13 अगस्त को समाचार लिखे जाने तक याचिका पर सत्यापित हस्ताक्षरों की संख्या 16 हजार से अधिक हो चुकी थी।
याचिका में कहा गया है कि सार्वजनिक प्रतिनिधियों को सरकार की नीतियों, समितियों और विशेषज्ञों की योग्यता पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन बहस व्यक्ति पर कटाक्ष या अपमानजनक विशेषण तक नहीं पहुंचनी चाहिए। याचिका के आयोजकों के अनुसार, अभियान किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के समर्थन में नहीं बल्कि अकादमिक संस्थानों की गरिमा और संसद में सम्मानजनक संवाद के पक्ष में है, रिपोर्टों के मुताबिक इस अभियान को भारत के अलावा 38 से अधिक देशों में रहने वाले भारतीय वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का समर्थन मिला है। आयोजकों ने प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, छात्रों, पूर्व छात्रों और अकादमिक समुदाय से अभियान से जुड़ने की अपील की है।
विवाद की शुरुआत 28 जुलाई को लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षाओं से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान हुई। प्रियंका गांधी परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बनाई गई नई उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की संरचना पर सवाल उठा रही थीं। इसी दौरान उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा कि समिति में पूर्व आईबी प्रमुख, आईटी क्षेत्र से जुड़े लोग और एक ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ हैं और सवाल किया कि ऐसे विशेषज्ञ को शिक्षा के बारे में क्या जानकारी होगी। इस टिप्पणी को IIT मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी की ओर इशारा माना गया। केंद्र ने 26 जुलाई 2026 को नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में परीक्षा सुधारों के लिए उच्चस्तरीय टास्क फोर्स बनाने की घोषणा की थी।
ऑनलाइन अभियान में प्रियंका गांधी की टिप्पणी की सबसे बड़ी आलोचना इसी आधार पर की गई है। प्रो. कामकोटी का मुख्य अकादमिक क्षेत्र कंप्यूटर साइंस है। IIT मद्रास के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी और VLSI डिजाइन के विशेषज्ञ हैं। वे भारत में विकसित ‘SHAKTI’ माइक्रोप्रोसेसर परियोजना का नेतृत्व भी कर चुके हैं। ऐसे में परीक्षा सुधार समिति में उनकी नियुक्ति पर सवाल जरूर पूछे जा सकते हैं—मसलन उनकी विशेषज्ञता परीक्षा प्रणाली की समस्याओं के समाधान में किस प्रकार उपयोगी होगी, समिति की चयन प्रक्रिया क्या थी और इसके सदस्यों की जवाबदेही कैसे तय होगी। लेकिन एक लंबे अकादमिक करियर वाले वैज्ञानिक को उसकी संपूर्ण पेशेवर पहचान से अलग कर केवल एक विवादित बयान के आधार पर ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ कहना राजनीतिक व्यंग्य तो हो सकता है, गंभीर अकादमिक आलोचना नहीं।
यही वह बिंदु है जहां प्रियंका गांधी की टिप्पणी कमजोर दिखाई देती है। संसद में यदि किसी विशेषज्ञ की योग्यता को चुनौती दी जानी थी तो उनके अनुभव, विशेषज्ञता, समिति में भूमिका और परीक्षा सुधार से उनके संबंध पर तथ्यात्मक सवाल अधिक प्रभावी होते। व्यक्तिगत व्यंग्य ने मूल प्रश्न—देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे होगा—को पीछे धकेल दिया और बहस का केंद्र स्वयं टिप्पणी बन गई।
विवाद का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रो. कामकोटी पहले गोमूत्र के कथित औषधीय गुणों के बारे में सार्वजनिक टिप्पणियां कर चुके हैं। जनवरी 2025 के एक कार्यक्रम से जुड़े उनके बयानों में गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों तथा कुछ स्वास्थ्य समस्याओं में उपयोगिता का दावा सामने आया था। इन टिप्पणियों की आलोचना भी हुई और वैज्ञानिक प्रमाणों को लेकर सवाल उठे।
इसलिए यह कहना भी उचित नहीं होगा कि किसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक की किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य-संबंधी टिप्पणी की आलोचना ही नहीं की जा सकती। वैज्ञानिक पद या प्रतिष्ठा किसी दावे को स्वतः सही नहीं बना देती। स्वास्थ्य से जुड़ा दावा हो तो उसे प्रकाशित शोध, परीक्षण, प्रमाण और वैज्ञानिक समीक्षा की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
प्रियंका गांधी चाहतीं तो कामकोटी के गोमूत्र संबंधी दावों के वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाकर सरकार से पूछ सकती थीं कि परीक्षा सुधार समिति में सदस्यों को चुनने के क्या मानदंड हैं। ऐसा करने से बहस तथ्यों और जवाबदेही पर केंद्रित रहती। ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ जैसा विशेषण इस्तेमाल करने से आलोचना का स्वर व्यक्तिगत हो गया और सरकार से पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छूट गए।
Change.org की याचिका इसी व्यापक सवाल को उठाती है। इसमें कहा गया है कि नीति या समिति की आलोचना की जानी चाहिए, लेकिन विद्वानों और विशेषज्ञों का मूल्यांकन उनकी अकादमिक उपलब्धियों, पेशेवर क्षमता और समाज में योगदान के आधार पर होना चाहिए। याचिका लोकसभा अध्यक्ष से टिप्पणी का संज्ञान लेने और संबंधित सांसद से इसे वापस लेकर खेद व्यक्त करने की मांग करती है।
इस विवाद को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई मान लेना भी विषय को छोटा करना होगा। सवाल यह है कि संसद में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और तीखी आलोचना के बावजूद सार्वजनिक संवाद की सीमा क्या होनी चाहिए। राजनीतिक नेता सरकार की समितियों, वैज्ञानिकों और संस्थानों से कड़े सवाल पूछें—यह लोकतंत्र के लिए जरूरी है। लेकिन व्यक्ति की पहचान को किसी विवादित धारणा तक सीमित कर देना बहस की गुणवत्ता को कमजोर कर सकता है।
दूसरी ओर, वैज्ञानिक और संस्थागत प्रतिष्ठा का अर्थ यह भी नहीं है कि विशेषज्ञों के सार्वजनिक दावों को जांच से छूट मिल जाए। कामकोटी के स्वास्थ्य संबंधी पूर्व दावों पर वैज्ञानिक प्रमाण मांगना पूरी तरह वैध है। लेकिन उन्हीं दावों के आधार पर उनकी दशकों की कंप्यूटर विज्ञान संबंधी विशेषज्ञता को नकार देना तथ्यात्मक बहस का विकल्प नहीं हो सकता।






