JPSC-JSSC घोटाले का ‘कंपनी कनेक्शन’! 4 कंपनियां, बिचौलिये और करोड़ों के कथित खेल की जांच
रांची: झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच अब सिर्फ परीक्षा और OMR तक सीमित नहीं रह गई है। जांच का दायरा परीक्षा संचालन करने वाली कंपनियों, कथित बिचौलियों, पूर्व अधिकारियों और पैसों के कथित नेटवर्क तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। जांच के दौरान आरोपी अभय कुमार तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी के CID को दिए कथित बयान में अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने, कथित आर्थिक लेन-देन और इंटरव्यू प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे गंभीर दावे सामने आए हैं। इन दावों में ICN India Private Limited, Binssis Technology और TDPL जैसी कंपनियों के नाम सामने आने की बात कही गई है। लेकिन सबसे जरूरी बात—ये सभी आरोप जांच का हिस्सा हैं। किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी साबित करने वाला अंतिम न्यायिक फैसला अभी नहीं हुआ है।अब सवाल यह है कि क्या JPSC-JSSC परीक्षा विवाद के पीछे अलग-अलग कंपनियों और लोगों से जुड़ा कोई संगठित नेटवर्क था?
सात अभ्यर्थियों को कथित फायदा पहुंचाने का दावा
अभय तिवारी के कथित बयान में दावा किया गया है कि कथित व्यवस्था के जरिए करीब सात अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और प्रत्येक से लगभग 15 लाख रुपये लिए गए। बयान में इंटरव्यू प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए अभ्यर्थियों के कोड की कथित डी-कोडिंग का भी उल्लेख है। आरोप के अनुसार कुछ अभ्यर्थियों की पहचान इंटरव्यू से पहले किए जाने और उन्हें कथित तौर पर विशेष बोर्ड में भेजने की कोशिश की जाती थी। कथित बयान में यह भी दावा किया गया है कि कुछ JPSC सदस्यों की ओर से TDPL के निदेशक रामवीर सिंह पर अभ्यर्थियों के कोड उपलब्ध कराने का दबाव बनाया जाता था। अगर जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह परीक्षा की गोपनीयता और इंटरव्यू प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बेहद गंभीर सवाल होगा।
CDPO परीक्षा में भी कथित पैसों का खेल?
जांच में सामने आए कथित बयान में CDPO परीक्षा का भी उल्लेख है। अभय तिवारी के मुताबिक, इस परीक्षा में भी अभ्यर्थियों को कथित तौर पर लाभ पहुंचाने के लिए करीब 10 लाख रुपये प्रति अभ्यर्थी का रेट होने की बात कही गई। बयान में अभ्यर्थी रजक का जिक्र करते हुए दावा किया गया है कि उसका इंटरव्यू बोर्ड तत्कालीन JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते के पास था और उसके मामले में कथित तौर पर 15 लाख रुपये दिए जाने की बात सामने आई। इसी तरह काजल भारती के मामले में अजीता भट्टाचार्य के कथित PA ब्रजराम को 10 लाख रुपये दिए जाने का दावा किया गया है। इन दावों का जिक्र कथित बयानों में है। इनकी वास्तविकता जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों से ही तय होगी।
ICN India और Binssis Technology पर भी सवाल
अब जांच का दायरा उन कंपनियों तक पहुंच रहा है, जिन्हें अलग-अलग परीक्षाओं के संचालन और तकनीकी व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। जांच में ICN India Private Limited और Binssis Technology के नाम सामने आने की बात कही गई है। आरोप है कि अलग-अलग कंपनियों के माध्यम से परीक्षा से जुड़े ठेके हासिल किए गए और कुछ मामलों में प्रश्नपत्र, OMR तथा परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की आशंका सामने आई। ICN India से जुड़े बताए जा रहे आरके सिंह उर्फ मिथिलेश सिंह और Binssis Technology से जुड़े बताए जा रहे अरुण कुमार की भूमिका को लेकर भी जांच की बात कही गई है। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि क्या इन कंपनियों के बीच केवल कारोबारी संबंध थे या इनके बीच कोई ऐसा कनेक्शन भी था, जिसका इस्तेमाल परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया।
कंपनियों के बीच कनेक्शन की जांच क्यों अहम?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि JPSC और JSSC की परीक्षाओं में परीक्षा संचालन, डेटा मैनेजमेंट, OMR, प्रश्नपत्र और तकनीकी व्यवस्था जैसे कई संवेदनशील काम बाहरी एजेंसियों को दिए जाते हैं। ऐसे में अगर एक ही नेटवर्क से जुड़ी अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग परीक्षाओं में काम कर रही थीं, तो जांच एजेंसी के सामने यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि—
- किस कंपनी को कौन सा काम मिला?
- टेंडर किस आधार पर मिला?
- कंपनियों के निदेशक और कर्मचारी आपस में जुड़े थे या नहीं?
- परीक्षा के गोपनीय डेटा तक किसकी पहुंच थी?
और सबसे बड़ा सवाल
क्या कथित पैसों का नेटवर्क परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसियों तक पहुंचता था?
JSSC की पुरानी परीक्षाएं भी जांच के रडार पर
मौजूदा जांच के बीच JSSC की पुरानी परीक्षाओं पर भी नजर जा रही है। 2022 की JSSC जूनियर इंजीनियर परीक्षा में प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले कथित तौर पर वायरल होने के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। इसके बाद 2024 की JSSC CGL परीक्षा भी प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के कारण विवादों में रही। अब जांच एजेंसियों के सामने यह महत्वपूर्ण चुनौती है कि क्या इन पुराने मामलों और वर्तमान JPSC-JSSC विवाद के बीच कोई समान पैटर्न या कनेक्शन मौजूद है। अगर परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसियों, तकनीकी कर्मचारियों, कथित बिचौलियों और पुराने मामलों के बीच कोई साझा कड़ी सामने आती है, तो जांच का दायरा काफी बड़ा हो सकता है।
अब टेंडर से लेकर बैंक ट्रांजेक्शन तक जांच जरूरी
JPSC-JSSC विवाद में अब सिर्फ बयान और आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। जांच को यह साबित करना होगा कि कथित तौर पर पैसे किसने दिए, किसने लिए, पैसा किस माध्यम से पहुंचा और उसके बदले किस अभ्यर्थी को क्या लाभ मिला। इसके लिए बैंक ट्रांजेक्शन, डिजिटल चैट, कॉल डिटेल, मोबाइल डेटा, ई-मेल, कंपनी के दस्तावेज, टेंडर प्रक्रिया और परीक्षा से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। साथ ही यह भी देखना होगा कि अलग-अलग कंपनियों को काम देने की प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं।
लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य का सवाल
JPSC और JSSC की परीक्षाएं झारखंड के लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा रास्ता हैं। अगर परीक्षा में पैसे के बदले कथित तौर पर लाभ पहुंचाने का कोई नेटवर्क वास्तव में मौजूद था, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों को हुआ होगा जिन्होंने वर्षों तक मेहनत करके परीक्षा दी। इसलिए अब जांच का असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन आरोपी है? सवाल यह है कि—
- कौन-कौन इस कथित नेटवर्क से जुड़ा था?
- कितनी परीक्षाएं प्रभावित हुईं?
- कितने अभ्यर्थियों को कथित लाभ मिला?
- कितने पैसे का लेन-देन हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण क्या झारखंड की भर्ती परीक्षा व्यवस्था में कोई ऐसा सिस्टम बनाया गया था, जिसमें पैसे और पहुंच के जरिए मेरिट को प्रभावित किया जा सकता था?
फिलहाल अभय तिवारी के कथित बयान और अन्य दस्तावेजों में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। CID की जांच और अदालत में सामने आने वाले साक्ष्य ही तय करेंगे कि कौन से आरोप सही हैं और कौन से नहीं। लेकिन एक बात साफ है—JPSC-JSSC विवाद अब सिर्फ परीक्षा का विवाद नहीं रहा। यह झारखंड के लाखों युवाओं के भरोसे और पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन चुका है।






