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700 करोड़ लीटर की ‘एथेनॉल मुसीबत’! E20 के लिए बढ़ाई क्षमता, अब खपाना मुश्किल; क्या सरकार की नीति उलटी पड़ रही?

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E20 से आगे बढ़ना ही क्या समाधान है?

नई दिल्ली: भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने यानी E20 लक्ष्य को तय समय से करीब पांच साल पहले हासिल कर लिया। लेकिन जिस तेजी से एथेनॉल उत्पादन की क्षमता बढ़ाई गई, अब उसी क्षमता को लेकर नया सवाल खड़ा हो गया है—क्या देश ने जरूरत से ज्यादा एथेनॉल उत्पादन क्षमता तैयार कर ली है? ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के आंकड़ों के मुताबिक देश में एथेनॉल की स्थापित उत्पादन क्षमता करीब 2,000 करोड़ लीटर पहुंच चुकी है, जबकि मौजूदा EBP और अन्य औद्योगिक जरूरतों के मुकाबले लगभग 700 करोड़ लीटर की अतिरिक्त यानी ‘नोटional surplus capacity’ बताई जा रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि 700 करोड़ लीटर एथेनॉल टैंकों में बिना बिके पड़ा है, बल्कि उद्योग के पास मौजूदा मांग से काफी अधिक उत्पादन क्षमता है।

E20 का लक्ष्य हासिल, लेकिन अब सामने आया ‘सरप्लस’ का सवाल
सरकार के अनुसार, पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग 2013-14 में 1.5 प्रतिशत से भी कम थी, जो 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसी दौरान एथेनॉल की स्थापित क्षमता करीब 421 करोड़ लीटर से बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई। एथेनॉल की खरीद भी करीब 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 2025-26 में 1,200 करोड़ लीटर से ज्यादा होने का अनुमान है। यानी सरकार ने उत्पादन क्षमता खड़ी करने में बड़ा विस्तार किया। लेकिन अब चुनौती यह है कि इस क्षमता का इस्तेमाल कितनी तेजी से हो सकता है। AIDA के मुताबिक करीब 370 डिस्टिलरी चालू हैं और लगभग 40 अन्य परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। उद्योग का कहना है कि मौजूदा मांग की तुलना में करीब 700 करोड़ लीटर की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है।

लेकिन क्या 700 करोड़ लीटर एथेनॉल सच में बेकार पड़ा है?
यहां तस्वीर को ठीक से समझना जरूरी है। 700 करोड़ लीटर का आंकड़ा मौजूदा ‘unsold stock’ नहीं, बल्कि अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का अनुमान है। यानी ऐसा नहीं है कि देश के गोदामों में 700 करोड़ लीटर एथेनॉल बिकने के इंतजार में जमा है। असल चिंता यह है कि अगर मांग मौजूदा स्तर पर बनी रहती है और उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती जाती है, तो कई प्लांट अपनी पूरी क्षमता पर उत्पादन नहीं कर पाएंगे। इसका सीधा असर डिस्टिलरी की कमाई, क्षमता उपयोग और उन निवेशों की वापसी पर पड़ सकता है, जो नई एथेनॉल इकाइयां लगाने में किए गए हैं।

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E20 से आगे बढ़ना ही क्या समाधान है?
यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर घरेलू पेट्रोल में एथेनॉल की खपत बढ़ानी है तो blending percentage को आगे बढ़ाना एक रास्ता हो सकता है। लेकिन इसके लिए ज्यादा एथेनॉल-मिश्रित ईंधन के अनुरूप वाहन और पर्याप्त बाजार की जरूरत होगी। इसी वजह से एथेनॉल उद्योग की नजर E20 से आगे E30, E85 या E100 जैसे उच्च ब्लेंडिंग स्तरों और flex-fuel वाहनों पर भी है। लेकिन यहां भी बड़ा सवाल है—क्या देश में वाहन बाजार इतनी तेजी से बदल पाएगा कि मौजूदा अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल हो सके? भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने अगस्त 2026 में लिखे एक लेख में पुराने वाहनों के लिए E10 उपलब्ध रखने और E20 से आगे बढ़ने से पहले लागत तथा food-versus-fuel trade-off का विस्तृत आकलन करने की बात कही थी।

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सरकार के सामने दूसरा रास्ता—एथेनॉल का निर्यात
घरेलू मांग अगर उत्पादन क्षमता की रफ्तार से नहीं बढ़ती है, तो उद्योग अब दूसरे बाजार तलाश रहा है। AIDA के मुताबिक भारत पड़ोसी देशों सहित दूसरे बाजारों में एथेनॉल निर्यात की संभावनाएं तलाश रहा है। नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों में संभावित मांग को लेकर भी उद्योग की नजर है। लेकिन निर्यात अपने आप में स्थायी समाधान होगा या नहीं, यह अंतरराष्ट्रीय कीमत, लॉजिस्टिक्स और दूसरे देशों की biofuel policies पर निर्भर करेगा।

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सरकार कह रही है—E20 से ऊर्जा सुरक्षा को फायदा
सरकार इस आलोचना से सहमत नहीं है कि E20 कार्यक्रम को केवल अतिरिक्त एथेनॉल क्षमता खपाने के लिए आगे बढ़ाया गया। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार EBP कार्यक्रम का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना, किसानों को बाजार उपलब्ध कराना और विदेशी मुद्रा की बचत करना है। सरकार ने यह भी कहा है कि खाद्य सुरक्षा से समझौता किए बिना surplus foodgrain का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में किया जाता है। यानी सरकार की दलील है कि एथेनॉल कार्यक्रम को सिर्फ उत्पादन और खपत के आंकड़े से नहीं देखा जाना चाहिए।

असली सवाल: नीति फेल हुई या क्षमता आगे निकल गई?
फिलहाल E20 नीति को ‘फेल’ घोषित करना तथ्यों से ज्यादा बड़ा निष्कर्ष होगा। भारत ने 20 प्रतिशत blending का लक्ष्य हासिल किया है और एथेनॉल खरीद भी तेजी से बढ़ी है। लेकिन साथ ही उत्पादन क्षमता और मौजूदा मांग के बीच अंतर को लेकर उद्योग की चिंता वास्तविक है। इसलिए असली चुनौती अब E20 हासिल करने की नहीं, बल्कि एथेनॉल उद्योग की बनाई गई विशाल उत्पादन क्षमता को आर्थिक रूप से टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल करने की है। अगर मांग तेजी से नहीं बढ़ती, तो प्लांट कम क्षमता पर चल सकते हैं। अगर E20 से आगे बढ़ना है तो वाहन संगतता, उपभोक्ता लागत, कृषि संसाधन और food-versus-fuel जैसे सवालों का जवाब देना होगा। और अगर निर्यात पर निर्भरता बढ़ती है तो वैश्विक बाजार भी महत्वपूर्ण हो जाएगा।

यानी 700 करोड़ लीटर की कहानी ‘एथेनॉल गोदाम में सड़ रहा है’ से ज्यादा बड़ी है। यह उस सवाल की कहानी है कि भारत ने भविष्य की मांग के लिए जितनी उत्पादन क्षमता खड़ी कर दी है, उसे अब मौजूदा बाजार कितनी तेजी से absorb कर पाएगा।

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