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अखड़े से दुनिया तक पहुंची झारखंड के मांदर की गूंज, मिला GI Tag

Jharkhand Mandar GI Tag

Mandar of Jharkhand’ के नाम से हुआ पंजीकरण, गुमला के पारंपरिक कारीगरों और सदियों पुरानी लोककला को मिली नई पहचान

रांची: झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक शिल्प को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर को Geographical Indication यानी GI Tag मिल गया है। भारत सरकार के GI रजिस्ट्री में इसे ‘Mandar of Jharkhand’ के नाम से पंजीकृत किया गया है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसका आवेदन नंबर 777 है और इसका स्टेटस Registered है। इसके आवेदक के रूप में गुमला के रायडीह स्थित Raidih Mandar Producer Company Limited दर्ज है। मांदर सिर्फ एक पारंपरिक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड के लोकजीवन, आदिवासी संस्कृति और सामुदायिक परंपराओं का अहम हिस्सा है। सरहुल, करम जैसे पर्वों से लेकर अखड़ा और पारंपरिक नृत्यों तक मांदर की थाप झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को आवाज देती रही है।

‘Mandar of Jharkhand’ के नाम से मिली आधिकारिक पहचान
GI Tag मिलने के साथ झारखंड के मांदर को अब उसकी भौगोलिक और पारंपरिक पहचान के साथ आधिकारिक दर्जा मिल गया है। GI रजिस्ट्री के रिकॉर्ड में ‘Mandar of Jharkhand’ को Class 15 में Handicrafts के तहत पंजीकृत किया गया है और भौगोलिक क्षेत्र के रूप में पूरा झारखंड दर्ज है। इस पहचान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मांदर के निर्माण और उसकी पारंपरिक तकनीक से जुड़े कारीगरों की भूमिका पीढ़ियों से चली आ रही है।

गुमला के कारीगरों को भी मिली नई पहचान
मांदर के GI पंजीकरण में गुमला के रायडीह क्षेत्र की संस्था को आवेदक के रूप में दर्ज किया गया है। इससे गुमला के पारंपरिक मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों की पहचान को भी औपचारिक मंच मिला है। GI Tag किसी उत्पाद की उस खास भौगोलिक पहचान और उससे जुड़े पारंपरिक गुणों को मान्यता देता है, जो किसी विशेष क्षेत्र से संबंधित होते हैं। मांदर के मामले में यह पहचान झारखंड की पारंपरिक निर्माण कला और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है।

Adiwasi Mahotsav

सरहुल से अखड़ा तक मांदर की खास जगह
झारखंड के गांवों और आदिवासी समाज में मांदर की थाप का अपना अलग महत्व है। पारंपरिक पर्वों, नृत्यों और सामुदायिक आयोजनों में मांदर की आवाज माहौल को जीवंत करती है। सरहुल और करम जैसे प्रमुख पर्वों के दौरान पारंपरिक नृत्य और गीतों के साथ मांदर की थाप सुनाई देती है। अखड़ा संस्कृति में भी मांदर का महत्वपूर्ण स्थान है। यही वजह है कि मांदर को मिला GI Tag सिर्फ एक उत्पाद की पहचान नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को औपचारिक पहचान मिलने के तौर पर देखा जा रहा है।

happy Teacher Day
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कारीगरों और पारंपरिक कला के संरक्षण की उम्मीद
मांदर को GI पहचान मिलने से इससे जुड़े कारीगरों के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। पारंपरिक कला को बाजार और व्यापक पहचान मिलने से इसके संरक्षण और संवर्धन को भी गति मिल सकती है। GI पहचान का उद्देश्य संबंधित क्षेत्र के पारंपरिक उत्पाद की विशिष्टता को सुरक्षित रखना और उसकी पहचान को मजबूत करना है। ऐसे में मांदर के साथ काम करने वाले कारीगरों के कौशल को आगे बढ़ाने के लिए भी यह उपलब्धि महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को एक और मुकाम
मांदर से पहले भी झारखंड के कई पारंपरिक उत्पादों और हस्तशिल्प को GI पहचान मिल चुकी है। आधिकारिक GI रिकॉर्ड में झारखंड के Tribal Jewellery, Bamboo Crafts और Tussar Silk Sarees & Fabrics जैसे उत्पाद भी Registered हैं। अब ‘Mandar of Jharkhand’ के पंजीकरण से राज्य की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत की सूची में एक और महत्वपूर्ण पहचान जुड़ गई है।

अब झारखंड की थाप पहुंचेगी दूर तक
मांदर की पहचान अब सिर्फ झारखंड के अखड़ों और लोकपर्वों तक सीमित नहीं रहेगी। GI Tag के साथ इसकी पारंपरिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने का रास्ता मजबूत हुआ है। जिस मांदर की थाप ने सदियों से झारखंड के अखड़ों को जीवंत रखा, अब उसी मांदर को ‘Mandar of Jharkhand’ के नाम से आधिकारिक पहचान मिल गई है। अखड़े से उठी यह थाप अब दुनिया तक पहुंचने की नई राह पर है।

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