क्यों मनाया जाता है धनतेरस? जानिए भगवान धन्वंतरि की कथा, यम दीप की परंपरा और इस पर्व का पूरा महत्व
सोना-चांदी खरीदने से कहीं बड़ा है इस पर्व का महत्व, जानिए धन्वंतरि से यम दीप तक पूरी कथा
मुनादी लाइव डेस्क: दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। इस दिन बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, लोग सोना-चांदी, बर्तन, आभूषण और घर-गृहस्थी से जुड़ी नई वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। लेकिन धनतेरस सिर्फ खरीदारी का दिन नहीं है। इसके पीछे स्वास्थ्य, आयु, समृद्धि, भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और यमराज से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और प्राचीन कथाएं हैं। इस वर्ष धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह करीब 10:30 बजे शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह करीब 10:47 बजे समाप्त होगी। अलग-अलग शहरों में पूजा का मुहूर्त कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।
धनतेरस का असली अर्थ क्या है?
धनतेरस को संस्कृत में धनत्रयोदशी कहा जाता है। इसका संबंध कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से है। दीपावली के पांच दिनों के पर्व में इसे पहला प्रमुख दिन माना जाता है। आम तौर पर धनतेरस को धन और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन लोग मानते हैं कि घर में नई वस्तु, विशेष रूप से धातु, सोना या चांदी लाने से समृद्धि का शुभ आगमन होता है। लेकिन इस पर्व का एक दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य है। धनतेरस को धन्वंतरि त्रयोदशी भी कहा जाता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में उन्हें देवताओं का वैद्य और भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। इसलिए धनतेरस का संदेश केवल धन प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना से भी जुड़ा है।
समुद्र मंथन से कैसे जुड़े भगवान धन्वंतरि?
धनतेरस की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक मान्यताओं में से एक का संबंध समुद्र मंथन से है। पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। समुद्र मंथन से अनेक दिव्य वस्तुएं और शक्तियां प्रकट हुईं। इसी क्रम में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। इसी वजह से धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। यही कारण है कि धनतेरस का अर्थ केवल ‘धन का त्योहार’ समझना अधूरा है। भारतीय धार्मिक परंपरा में धन का एक व्यापक अर्थ है—जिसमें स्वास्थ्य, आयु, सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली भी शामिल है।
धनतेरस पर सोना-चांदी और बर्तन खरीदने की परंपरा क्यों?
धनतेरस आते ही बाजारों में सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के, बर्तन, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान और घर की नई वस्तुओं की खरीदारी शुरू हो जाती है। धार्मिक मान्यता में इस दिन नई वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से सोना, चांदी और धातु के बर्तन खरीदने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। समय के साथ यह परंपरा बदलती भी गई है। पहले जहां धातु के बर्तन या चांदी की वस्तुएं प्रमुख थीं, वहीं आधुनिक समय में लोग अपनी आवश्यकता और सामर्थ्य के अनुसार अलग-अलग वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि खरीदारी को धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में देखा जाता है; इसे किसी निश्चित आर्थिक लाभ की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
धनतेरस पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा क्यों?
धनतेरस को माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की परंपरा भी है। माता लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी माना जाता है, जबकि भगवान कुबेर को धन के संरक्षक और देवताओं के कोषाध्यक्ष के रूप में धार्मिक परंपरा में स्थान प्राप्त है। इसलिए धनतेरस पर कई परिवारों में लक्ष्मी-कुबेर की पूजा की जाती है और घर में सुख-समृद्धि तथा आर्थिक स्थिरता की कामना की जाती है। धार्मिक दृष्टि से इसका संदेश यह भी है कि धन का उपयोग केवल व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि परिवार, समाज और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए भी होना चाहिए।
धनतेरस पर क्यों जलाया जाता है यम दीप?
धनतेरस की सबसे अलग और महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है यम दीप। इस दिन शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इसे यमराज के नाम का दीप माना जाता है। मान्यता है कि यम दीप जलाने से परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और दीर्घायु की कामना पूरी होती है। यम दीप की परंपरा यह भी याद दिलाती है कि धन और संपत्ति के साथ जीवन और आयु का महत्व भी समझना चाहिए।
राजा हेम की लोकप्रिय कथा क्या कहती है?
धनतेरस से जुड़ी एक बेहद लोकप्रिय लोक-धार्मिक कथा राजा हेम और उनके पुत्र की है। कथा के अनुसार राजा हेम के पुत्र की कुंडली में अल्पायु का योग बताया गया था। भविष्यवाणी के मुताबिक विवाह के कुछ समय बाद उसके जीवन पर संकट आने वाला था। विवाह के बाद जब वह समय आया, तब यमराज के दूत उसके प्राण लेने पहुंचे। कथा के अनुसार उसकी पत्नी को इस संकट का आभास हो गया था। उसने अपने पति को जागते रखने के लिए घर में दीप जलाए और सोने-चांदी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं को इस तरह सजाया कि चारों ओर प्रकाश फैल गया। कथा में आगे बताया जाता है कि यमदूत उस प्रकाश और गतिविधियों के बीच अंदर नहीं जा सके। इसके बाद यमराज भी वहां पहुंचे, लेकिन परिस्थितियों के कारण उस युवक के प्राण नहीं लिए गए। इसी लोकप्रचलित कथा को धनतेरस पर यम दीप जलाने की परंपरा से जोड़ा जाता है। हालांकि इस कथा को प्रस्तुत करते समय यह समझना जरूरी है कि राजा हेम की पूरी कहानी एक लोकप्रिय धार्मिक कथा और परंपरागत मान्यता के रूप में प्रचलित है। इसे किसी एक प्राचीन ग्रंथ में उसी रूप में दर्ज ऐतिहासिक घटना के तौर पर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यम दीप का संदेश सिर्फ मृत्यु से बचाव नहीं
यम दीप की परंपरा को केवल डर या मृत्यु से बचने की मान्यता तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं है। भारतीय परंपरा में मृत्यु को जीवन का सत्य माना गया है। यम दीप व्यक्ति को जीवन के महत्व, समय की कीमत और परिवार की सुरक्षा की याद दिलाता है। धनतेरस के दिन एक ओर जहां घर में लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी होती है, वहीं दूसरी ओर यमराज के नाम दीप जलाकर जीवन और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। यानी इस पर्व में धन और मृत्यु, समृद्धि और स्वास्थ्य, भौतिक संपत्ति और जीवन-मूल्य—सभी को एक साथ जोड़ा गया है।
धनतेरस पर क्या-क्या किया जाता है?
धनतेरस के दिन अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं हैं। सामान्य रूप से लोग सुबह घर की सफाई करते हैं, पूजा स्थल तैयार करते हैं और शाम को दीप जलाते हैं। कई परिवारों में इस दिन लक्ष्मी-कुबेर पूजा की जाती है। भगवान धन्वंतरि की पूजा कर अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। लोग अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार सोना, चांदी, बर्तन या अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदते हैं। शाम के समय यम दीप जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है।
2026 में धनतेरस की पूजा का समय
2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को है। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार बिहार के कुछ स्थानों में धनतेरस पूजा का प्रदोषकाल लगभग शाम 5:28 बजे से 7:25 बजे के बीच बताया गया है। शहर के अनुसार समय बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना बेहतर है। नई दिल्ली के लिए धनतेरस पूजा का समय लगभग शाम 6:02 बजे से 7:57 बजे तक बताया गया है। इसलिए पाठकों को सलाह है कि पूजा या खरीदारी के लिए स्थानीय शहर के पंचांग के अनुसार समय जरूर जांचें।
धनतेरस में ‘धन’ का मतलब सिर्फ पैसा नहीं
आज धनतेरस को अक्सर बड़ी खरीदारी, सोना-चांदी और बाजार की चमक से जोड़ दिया जाता है। लेकिन इसकी धार्मिक अवधारणा इससे कहीं बड़ी है। भगवान धन्वंतरि की कथा स्वास्थ्य को धन से ऊपर रखती है। माता लक्ष्मी की पूजा समृद्धि की कामना करती है। कुबेर की पूजा धन के संरक्षण और व्यवस्था का प्रतीक मानी जाती है। और यम दीप जीवन तथा दीर्घायु की याद दिलाता है। इस तरह धनतेरस का संदेश है कि संपत्ति तभी सार्थक है जब जीवन स्वस्थ हो, परिवार सुरक्षित हो और घर में सुख-शांति बनी रहे।
आज के समय में धनतेरस का संदेश
आधुनिक जीवन में धनतेरस को नए तरीके से समझने की जरूरत भी है। आज लोग धन कमाने की दौड़ में स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देते हैं। तनाव, अनियमित दिनचर्या और जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में धनतेरस का भगवान धन्वंतरि से जुड़ा पक्ष विशेष महत्व रखता है। त्योहार पर नई वस्तु खरीदना अपनी जगह है, लेकिन अपने स्वास्थ्य, परिवार और रिश्तों के लिए समय निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धनतेरस हमें यह याद दिलाता है कि बैंक खाते में मौजूद पैसा जीवन की हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। स्वास्थ्य, परिवार और मानसिक शांति भी वास्तविक संपत्ति हैं।
पांच दिवसीय दीपावली की शुरुआत
धनतेरस के साथ ही दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत मानी जाती है। इसके बाद नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज जैसे पर्व आते हैं। यानी धनतेरस केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि उस उत्सव की शुरुआत है जिसमें घर की सफाई से लेकर दीप प्रज्ज्वलन, लक्ष्मी पूजा, पारिवारिक मिलन और सामाजिक सद्भाव तक कई परंपराएं जुड़ी हैं।
धनतेरस की चमक बाजारों में दिखाई देती है, लेकिन इसकी असली चमक भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में छिपी है। समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट होने वाले भगवान धन्वंतरि हमें स्वास्थ्य का महत्व बताते हैं। माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा समृद्धि और धन का संदेश देती है। वहीं यम दीप जीवन और दीर्घायु की कामना से जुड़ा है। इसलिए धनतेरस का संदेश केवल इतना नहीं कि आज क्या खरीदा जाए। इसका बड़ा संदेश यह है कि धन के साथ स्वास्थ्य हो, समृद्धि के साथ संतोष हो और जीवन के साथ परिवार की खुशियां बनी रहें। यही धनतेरस की परंपरा का व्यापक अर्थ है।








