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झारखंड DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, एक दिन पहले बदले थे नियुक्ति के नियम

Tadasha Mishra DGP appointment

रांची/नई दिल्ली: झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। तदाशा मिश्रा की DGP पद पर नियुक्ति और झारखंड सरकार की 2025 की DGP नियुक्ति नियमावली को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। मामले में केंद्र ने आरोप लगाया है कि झारखंड सरकार ने DGP नियुक्ति की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा। केंद्र ने मांग की है कि झारखंड में DGP की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप की जाए। मामले में सबसे बड़ा सवाल DGP नियुक्ति की प्रक्रिया, अधिकारी की बची हुई सेवा अवधि और UPSC द्वारा तैयार पैनल से जुड़ा है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक UPSC द्वारा तैयार किए गए पैनल में शामिल अधिकारियों में से DGP का चयन करना चाहिए था।

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर क्यों उठा विवाद?
केंद्र सरकार की याचिका में 30 दिसंबर 2025 को तदाशा मिश्रा की झारखंड DGP के रूप में हुई नियुक्ति को भी चुनौती दी गई है। मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति के ठीक एक दिन पहले यानी 29 दिसंबर 2025 को झारखंड सरकार ने DGP नियुक्ति से जुड़े 2025 के नियमों में संशोधन किया था। केंद्र के मुताबिक, इस संशोधन के जरिए DGP पद के लिए अधिकारी की कम से कम छह महीने की शेष सेवा से जुड़ी शर्त को हटा दिया गया था। इसके अगले ही दिन तदाशा मिश्रा को DGP नियुक्त किया गया, जबकि उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर 2025 को होनी थी। यही घटनाक्रम अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का प्रमुख आधार बना है।

एक दिन पहले नियम बदले, अगले दिन DGP नियुक्ति
केंद्र सरकार का तर्क है कि DGP नियुक्ति के नियम में बदलाव और उसके तुरंत बाद तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के पहले से तय दिशा-निर्देशों की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। केंद्र ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि झारखंड सरकार ने DGP चयन के लिए 2025 में नियम बनाते समय सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया। केंद्र का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार राज्य सरकार को DGP पद के लिए UPSC द्वारा तैयार किए गए पैनल से अधिकारी का चयन करना चाहिए था। लेकिन झारखंड में अपनाई गई प्रक्रिया इस व्यवस्था से अलग थी।

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क्या है प्रकाश सिंह केस और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
DGP नियुक्ति का यह विवाद सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले से जुड़ा है। पुलिस सुधारों से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति और कार्यकाल को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए थे। DGP नियुक्ति के लिए UPSC द्वारा पैनल तैयार करने और उस पैनल से राज्य सरकार द्वारा अधिकारी का चयन करने की व्यवस्था इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है। केंद्र का आरोप है कि झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को पूरी तरह लागू करने के बजाय DGP नियुक्ति को लेकर अलग नियम बना लिए। केंद्र की याचिका में इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की “चयनात्मक व्याख्या” के रूप में बताया गया है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।

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केंद्र का दावा- UPSC पैनल से होना चाहिए था चयन
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि DGP की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार UPSC द्वारा तैयार पैनल का पालन करना चाहिए था। केंद्र के अनुसार, DGP नियुक्ति की प्रक्रिया में राज्य सरकार को अपनी अलग व्यवस्था बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। यही वजह है कि केंद्र ने झारखंड सरकार की 2025 की DGP चयन नियमावली और उसके आधार पर की गई नियुक्तियों को चुनौती दी है।

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सिर्फ तदाशा मिश्रा ही नहीं, अनुराग़ गुप्ता की नियुक्ति का भी मामला
इस मामले में विवाद सिर्फ तदाशा मिश्रा तक सीमित नहीं है। केंद्र की याचिका में IPS अधिकारी अनुराग गुप्ता की 2 फरवरी 2025 को DGP के रूप में हुई नियुक्ति का भी उल्लेख किया गया है। केंद्र के अनुसार, उस समय अनुराग गुप्ता की सेवा में करीब तीन महीने ही बचे थे और उनकी सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2025 को होनी थी। केंद्र ने अपनी याचिका में कहा है कि गृह मंत्रालय ने बाद में उनकी नियुक्ति को लेकर झारखंड सरकार को पत्र भी भेजे थे। अनुराग गुप्ता ने बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) का अनुरोध किया, जिसे झारखंड सरकार ने 6 नवंबर 2025 को स्वीकार किया था। इससे स्पष्ट है कि झारखंड में DGP नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर केंद्र और राज्य के बीच विवाद एक नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा है।

अमाइकस क्यूरी ने भी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर उठाए थे सवाल
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में अमाइकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने भी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का मुद्दा उठाया था। सितंबर में दाखिल उनकी रिपोर्ट में कहा गया था कि तदाशा मिश्रा को सेवानिवृत्ति से सिर्फ एक दिन पहले DGP नियुक्त करना प्रकाश सिंह मामले में तय सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। अमाइकस क्यूरी ने झारखंड की 2025 की DGP नियुक्ति नियमावली में राज्य सरकार को DGP को हटाने से संबंधित व्यापक विवेकाधिकार दिए जाने को लेकर भी चिंता जताई थी। अमाइकस क्यूरी की भूमिका अदालत की सहायता करने की होती है। इसलिए उनकी रिपोर्ट को अदालत का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

छह महीने की सेवा की शर्त बनी विवाद का केंद्र
पूरे विवाद में छह महीने की शेष सेवा अवधि एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। केंद्र के अनुसार, झारखंड सरकार ने 29 दिसंबर 2025 को नियमों में संशोधन कर DGP बनने वाले अधिकारी के लिए छह महीने की न्यूनतम शेष सेवा की शर्त को हटा दिया। इसके तुरंत बाद 30 दिसंबर को तदाशा मिश्रा की नियुक्ति हुई। उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर को थी। यानी नियुक्ति और सेवानिवृत्ति के बीच सिर्फ एक दिन का अंतर था। यही परिस्थितियां अब सुप्रीम कोर्ट के सामने कानूनी जांच का विषय बनी हुई हैं।

क्या झारखंड सरकार की नियमावली सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है?
अब इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या झारखंड सरकार द्वारा बनाई गई DGP नियुक्ति नियमावली सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के अनुरूप है। केंद्र का पक्ष है कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया। वहीं, राज्य सरकार का पक्ष और इस पूरे विवाद पर उसका विस्तृत जवाब न्यायालय के समक्ष मामले की आगे की सुनवाई में सामने आएगा। इसलिए फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया है। अभी मामला न्यायिक विचाराधीन है और अंतिम निर्णय आना बाकी है।

झारखंड में DGP नियुक्ति को लेकर पहले भी रहा है विवाद
झारखंड में पिछले कुछ समय से DGP की नियुक्ति और कार्यकाल को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। केंद्र की याचिका में अनुराग गुप्ता और तदाशा मिश्रा की नियुक्तियों का उल्लेख किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी झारखंड में DGP नियुक्ति की प्रक्रिया और अनुपालन को लेकर राज्य से जवाब मांगा था। मई 2026 में अदालत ने यह भी नोट किया था कि राज्य में कार्यवाहक DGP कार्यरत था और अनुपालन हलफनामा मांगा गया था। ऐसे में वर्तमान मामला झारखंड में पुलिस नेतृत्व की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब 9 अक्टूबर की सुनवाई पर रहेगी नजर
मामले में अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को सूचीबद्ध किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई में राज्य सरकार की नियमावली, तदाशा मिश्रा की नियुक्ति और प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर क्या रुख अपनाता है। अदालत के सामने मुख्य सवाल होंगे कि DGP नियुक्ति की प्रक्रिया कितनी हद तक सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप थी और क्या राज्य सरकार को DGP चयन के लिए UPSC पैनल की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक था। फिलहाल तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। अंतिम स्थिति अदालत के आगामी आदेश और सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।

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