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SIR के बीच चुनाव आयोग में बड़ा फेरबदल, करीब 20 CEO बदले; ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल

CEO Transfer

नई दिल्ली: देशभर में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी बहस के बीच चुनाव आयोग के प्रशासनिक ढांचे में बड़े स्तर पर फेरबदल सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2025 से 2026 के बीच करीब 18 से 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के Chief Electoral Officers (CEOs) बदले गए हैं। यह बदलाव मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फरवरी 2025 में पदभार संभालने के बाद हुआ है।

20 महीने में करीब 20 CEO का तबादला
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में करीब 8 से 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में CEO बदले गए, जबकि 2026 में अब तक कम से कम 10 और तबादले हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कई अधिकारियों का कार्यकाल दो साल से भी कम रहा, जबकि सामान्य तौर पर CEO के पद पर करीब तीन साल की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती रही है। इसी वजह से चुनाव आयोग के भीतर हुए इस प्रशासनिक बदलाव को सामान्य रूटीन ट्रांसफर से अलग एक बड़ा फेरबदल माना जा रहा है।

SIR के दौरान क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
यह फेरबदल ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग देश के अलग-अलग हिस्सों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है। SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना है, लेकिन इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और विभिन्न पक्षों की ओर से सवाल भी उठाए गए हैं। चुनाव आयोग ने दूसरी ओर यह स्पष्ट किया है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। आयोग ने उन मतदाताओं को फिर से सूची में शामिल करने के लिए विशेष अभियान चलाने का भी निर्देश दिया है, जो प्रक्रिया के दौरान छूट गए हों।

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बिहार से शुरू हुआ तबादलों का सिलसिला
रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में CEO स्तर पर बदलाव की शुरुआत बिहार से हुई थी। इसके बाद नागालैंड, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा समेत कई राज्यों में CEO बदले गए। जुलाई 2025 में मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भी नए CEO नियुक्त किए गए, जबकि अगस्त में मणिपुर और लद्दाख में बदलाव हुआ। 2025 के अंत में लक्षद्वीप के CEO का तबादला हुआ। रिपोर्ट में लक्षद्वीप को खास उदाहरण के तौर पर बताया गया है, जहां नवंबर 2025 से अक्टूबर 2026 के बीच तीन अलग-अलग अधिकारियों ने CEO के रूप में काम किया।

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2026 में भी जारी रहा फेरबदल
2026 में पंजाब में जनवरी में, दिल्ली और गुजरात में फरवरी में, सिक्किम में मार्च और चंडीगढ़ में अप्रैल में CEO स्तर पर बदलाव हुए। इसके बाद पश्चिम बंगाल और केरल में भी CEO पद पर बदलाव देखने को मिला। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तत्कालीन CEO मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाया गया और उनकी जगह नीलम मणि को CEO की जिम्मेदारी दी गई। केरल में अगस्त में डी. सजित बाबू ने रतन यू. केलकर की जगह ली।

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डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर स्तर पर भी बदलाव
सिर्फ राज्यों के CEO ही नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग के मुख्यालय में Deputy Election Commissioner (DEC) स्तर पर भी बदलाव हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2025 से अब तक कम से कम चार बड़े बदलाव इस स्तर पर हुए। मई 2025 में भानु प्रकाश येतुरु, सितंबर 2025 में पवन कुमार शर्मा और अक्टूबर 2026 में प्रकाश राजपुरोहित की नियुक्ति हुई। वहीं डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार को अगस्त 2026 में अचानक वापस भेजा गया था।

ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में सबसे ज्यादा चर्चा
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में पदभार संभाला था। उनके कार्यकाल में CEO स्तर पर हुए तबादलों की संख्या को लेकर अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज है। हालांकि, केवल तबादलों की संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हर बदलाव SIR से सीधे जुड़ा था। कई तबादले चुनावी कार्यक्रम, प्रशासनिक जरूरतों और राज्यों में अन्य जिम्मेदारियों के बदलाव के कारण भी हुए हैं।

SIR को लेकर पहले से विवाद
SIR को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच पहले से ही मतभेद हैं। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दाखिल हुई हैं। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के निलंबन की अंतरिम मांग पर आदेश देने से इनकार करते हुए चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। वहीं, हाल के दिनों में केरल विधानसभा ने भी CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है। यह देश में इस तरह का पहला विधानसभा प्रस्ताव बताया गया है। SIR के बीच चुनाव आयोग में करीब 18-20 CEO के बदलाव और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर हुए फेरबदल ने आयोग की प्रशासनिक संरचना को लेकर चर्चा जरूर बढ़ा दी है। हालांकि, इन तबादलों को सीधे SIR की प्रक्रिया से जोड़ने से पहले प्रत्येक नियुक्ति और उसके प्रशासनिक कारण को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।

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