मां चली गईं… अब किसे देखकर लौटेंगे हेमंत? रूपी सोरेन के जाने से सूना हो गया एक बेटे का संसार
रांची: कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके चले जाने के बाद जिंदगी में कोई दूसरा रिश्ता उनकी जगह नहीं ले सकता। मां भी ऐसा ही रिश्ता है। वह सिर्फ घर का एक सदस्य नहीं होतीं, वह घर की धड़कन होती हैं… वह आवाज होती हैं जो पूछती है—“बेटा, खाना खाया?” वह चेहरा होती हैं जिसे देखकर दुनिया की तमाम थकान उतर जाती है।
बुधवार की रात जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी मां रूपी सोरेन को अंतिम विदाई देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा—“बाबा के जाने के बाद मां ही मेरी सबसे बड़ी छांव थीं… आज वह छांव भी प्रकृति की गोद में समा गई।” तब उन शब्दों में मुख्यमंत्री नहीं था। वहां सिर्फ एक बेटा था… जिसने पहले पिता को खोया और अब मां की ममता भी हमेशा के लिए खो दी।
रांची के हिल व्यू अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझती मां को बचाने की आखिरी कोशिशें होती रहीं। डॉक्टर इलाज करते रहे, परिवार दुआ करता रहा और बेटा अस्पताल के गलियारों में उम्मीद थामे खड़ा रहा। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया, जब तमाम कोशिशें थम गईं।
मां चली गईं… और पीछे छोड़ गईं एक ऐसा सन्नाटा, जिसे शायद कोई शब्द कभी भर नहीं पाएगा।
जिस मां के आंचल में बेटा दुनिया भूल जाता था, आज वही आंचल नहीं रहा
मुख्यमंत्री होना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी है। हजारों लोग अपनी समस्याएं लेकर मुख्यमंत्री के पास आते हैं। फैसले लेने होते हैं, सरकार चलानी होती है, जनता के सवालों का जवाब देना होता है। लेकिन मां के सामने इंसान सिर्फ बेटा होता है। हेमंत सोरेन भी अपनी मां के सामने एक बेटे ही थे। कितनी भी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी क्यों न हो, मां के सामने हर पद छोटा पड़ जाता है। मां की आवाज में मिलने वाला भरोसा किसी सत्ता से नहीं मिलता और मां के हाथों के स्पर्श में मिलने वाला सुकून किसी कुर्सी में नहीं होता।
आज वही हाथ नहीं हैं, वही आवाज नहीं है, वही इंतजार नहीं है और शायद सबसे ज्यादा दर्द इस बात का है कि अब हेमंत सोरेन जब घर लौटेंगे, तो वह चेहरा दरवाजे पर उनका इंतजार करता नहीं मिलेगा।
शिबू सोरेन संघर्ष के जंगलों में थे, तब घर में मां अकेली लड़ रही थीं
रूपी सोरेन का जीवन सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की महिला का जीवन नहीं था। उनके हिस्से में भी संघर्ष कम नहीं आया। जब शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन की लड़ाई में घर से दूर रहते थे, जंगलों और गांवों में संघर्ष करते थे, तब घर और परिवार की जिम्मेदारी रुपी सोरेन के कंधों पर थी। बच्चों की चिंता, घर की चिंता और अनिश्चित भविष्य की चिंता—इन सबके बीच उन्होंने परिवार को संभाला। शिबू सोरेन को झारखंड आंदोलन का चेहरा दुनिया ने देखा। लेकिन उस संघर्ष के पीछे घर में खड़ी उस मां को शायद उतनी सुर्खियां कभी नहीं मिलीं।
उन्होंने मंचों पर भाषण नहीं दिए, उन्होंने नारे नहीं लगाए, उन्होंने राजनीतिक सभाओं में अपनी ताकत नहीं दिखाई। उन्होंने बस परिवार को संभाला… बच्चों को संभाला… और उस संघर्षशील परिवार को अपनी ममता की डोर से बांधे रखा।
कभी-कभी इतिहास में सबसे बड़ा योगदान वही होता है, जिसका कोई शोर नहीं होता।
तीन महीने पहले राष्ट्रपति भवन में मिली थी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान
कुछ महीने पहले का वह दृश्य शायद अब और भी ज्यादा भावुक कर देने वाला है। राष्ट्रपति भवन में स्वर्गीय शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया जा रहा था। सम्मान लेने के लिए रुपी सोरेन व्हीलचेयर पर पहुंची थीं। उम्र उनके शरीर पर साफ दिखाई दे रही थी। चेहरे पर जीवनभर के संघर्ष की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में गर्व था। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके हाथों में पद्म भूषण सौंपा, तो वह सिर्फ एक सम्मान समारोह नहीं था। वह उस परिवार की दशकों लंबी यात्रा का एक भावुक पड़ाव था। एक तरफ उस पति की स्मृति थी, जिसने झारखंड के लिए अपना जीवन खपा दिया था। दूसरी तरफ वह पत्नी थी, जिसने उस संघर्ष के दौरान परिवार को संभाला और सामने उनके हाथों में वह सम्मान था, जो उनके जीवनसाथी की तपस्या को देश की ओर से मिली एक बड़ी स्वीकृति थी। शायद उस दिन रुपी सोरेन के चेहरे की चमक में एक पत्नी का गर्व भी था… एक मां का संतोष भी… और एक लंबे संघर्ष के पूरा होने की शांति भी। किसे पता था कि कुछ ही समय बाद वही चेहरा हमेशा के लिए याद बन जाएगा।

बेटे की आंखों के सामने बुझ गई मां की आखिरी उम्मीद
बीमारी के इन आखिरी दिनों में परिवार ने उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की। इलाज के लिए बाहर ले जाया गया, फिर रांची वापसी हुई, लेकिन तबीयत लगातार बिगड़ती गई। अस्पताल में उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी अस्पताल पहुंचे। उम्मीद थी कि शायद मां फिर आंखें खोलेंगी…शायद फिर बेटे को देखेंगी…शायद फिर वही आवाज सुनाई देगी—
“हेमंत…”
लेकिन जिंदगी ने इस बार कोई मोहलत नहीं दी। एक मां, जो दशकों तक अपने बच्चों को जिंदगी की हर मुश्किल से बचाती रही, आखिरकार खुद जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई हार गईं।
अब घर वही होगा… लेकिन मां नहीं होंगी
किसी अपने के जाने के बाद घर की दीवारें वही रहती हैं, दरवाजा वही रहता है, कुर्सी वही रहती है, कमरा वही रहता है, लेकिन घर… घर नहीं रहता। क्योंकि घर को घर बनाने वाला इंसान चला जाता है। हेमंत सोरेन के लिए भी अब शायद यही सबसे बड़ा खालीपन है। पिता शिबू सोरेन के जाने के बाद जिस मां ने उन्हें संभाला, वह मां भी अब नहीं हैं। अब जब मुख्यमंत्री किसी बड़े फैसले के बाद घर लौटेंगे, तो शायद अनजाने में उनकी नजर उस जगह को तलाशेगी, जहां मां बैठती थीं। किसी त्योहार पर शायद एक पल को मन करेगा कि मां को फोन कर दें। किसी मुश्किल दिन शायद दिल कहेगा कि मां से बात कर लूं। फिर याद आएगा…अब फोन की दूसरी तरफ मां नहीं होंगी।
मां कभी जाती नहीं… बस दिखाई देना बंद हो जाती हैं
रूपी सोरेन आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मां की ममता कभी खत्म नहीं होती। वह बेटे की आवाज में रहती है, उसकी यादों में रहती है, उसकी हर कामयाबी में रहती है और उन खामोश पलों में भी रहती है, जब इंसान अकेले में अपनी मां को याद करता है।
रूपी सोरेन चली गईं, लेकिन अपने पीछे वह सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और ममता की एक पूरी कहानी छोड़ गई हैं। आज झारखंड ने एक मां को खोया है। एक परिवार ने अपनी मां को खोया है और हेमंत सोरेन ने…अपनी सबसे बड़ी छांव खो दी है।
शायद इसीलिए मां के जाने के बाद कहने को बहुत कुछ होता है…लेकिन शब्द सिर्फ एक ही निकलता है—




