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Tata Trusts का बड़ा मास्टरप्लान! देशभर में बनेंगे 40-50 नॉट-फॉर-प्रॉफिट अस्पताल, ऐसे होगा गरीबों का इलाज!

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अमीर मरीजों के इलाज से गरीबों की मदद कैसे होगी?

‘सबसे बड़ा’ बनने से पहले ‘सर्वश्रेष्ठ’ बनना जरूरी: नोएल टाटा

मुनादी Live के लिए कुमार अमित की रिपोर्ट

मुंबई: देश के हेल्थकेयर सेक्टर में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में Tata Trusts ने एक महत्वाकांक्षी योजना सामने रखी है। Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में देशभर में करीब 40 से 50 नॉट-फॉर-प्रॉफिट जनरल अस्पतालों का नेटवर्क विकसित करने की योजना का संकेत दिया है। इस प्रस्ताव की सबसे खास बात यह है कि अस्पतालों में इलाज का खर्च वहन करने में सक्षम मरीजों से मिलने वाली आय का इस्तेमाल आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में किया जा सकेगा। यह मॉडल सिर्फ अस्पतालों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक ऐसा हेल्थकेयर सिस्टम विकसित करने की सोच है, जिसमें आर्थिक स्थिति किसी व्यक्ति के इलाज की गुणवत्ता के रास्ते में बड़ी बाधा न बने। Tata Trusts का यह प्रस्ताव देश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और निजी अस्पतालों के बीच मौजूद उस अंतर को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जहां आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण इलाज की लागत कई परिवारों की पहुंच से बाहर हो जाती है। Tata Trusts की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब देश में गैर-संचारी बीमारियों, कैंसर, बुजुर्गों की स्वास्थ्य जरूरतों और गुणवत्तापूर्ण सेकेंडरी एवं टर्शियरी हेल्थकेयर की मांग लगातार बढ़ रही है।

क्या है Tata Trusts का 40-50 अस्पतालों का प्लान?
नोएल टाटा के नेतृत्व में Tata Trusts अब सिर्फ अलग-अलग स्वास्थ्य परियोजनाओं को फंड करने के बजाय लंबे समय तक काम करने वाले संस्थानों के निर्माण पर जोर दे रहा है। इसी सोच के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में 40 से 50 नॉट-फॉर-प्रॉफिट जनरल अस्पतालों का नेटवर्क विकसित करने की योजना सामने आई है। इन अस्पतालों का उद्देश्य व्यावसायिक मुनाफा कमाना नहीं होगा। इसके बजाय स्वास्थ्य सेवाओं को टिकाऊ तरीके से संचालित करते हुए जरूरतमंद लोगों तक इलाज पहुंचाने पर जोर होगा। हालांकि, प्रस्तावित अस्पतालों के लिए सभी स्थानों, कुल निवेश और निर्माण की समयसीमा का पूरा विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए इसे फिलहाल Tata Trusts की दीर्घकालिक संस्थागत और हेल्थकेयर रणनीति के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

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अमीर मरीजों के इलाज से गरीबों की मदद कैसे होगी?
इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका क्रॉस-सब्सिडी मॉडल है। आसान भाषा में समझें तो जो मरीज इलाज का पूरा खर्च वहन करने में सक्षम हैं, उनसे अस्पताल को मिलने वाली आय का एक हिस्सा उन मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यानी अस्पताल में मरीज की भुगतान क्षमता के आधार पर स्वास्थ्य सेवा का पूरा ढांचा अलग करने के बजाय एक ही संस्थान के भीतर अलग-अलग आर्थिक क्षमता वाले मरीजों को सेवा देने की कोशिश होगी। इस मॉडल का लक्ष्य यह है कि गुणवत्तापूर्ण इलाज सिर्फ उन लोगों तक सीमित न रहे, जो निजी अस्पतालों का महंगा खर्च उठा सकते हैं। हालांकि, इस मॉडल के वास्तविक संचालन, पात्रता मानदंड और भुगतान एवं सब्सिडी की व्यवस्था के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश आने बाकी हैं।

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सिर्फ अस्पताल नहीं, पूरा हेल्थकेयर सिस्टम मजबूत करने पर जोर
Tata Trusts की रणनीति केवल नए अस्पताल बनाने तक सीमित नहीं है। संस्था ने 2026 से 2031 की अवधि के लिए अपनी हेल्थकेयर रणनीति में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के साथ काम करने और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर भी जोर दिया है। रणनीति के तहत करीब 75 ब्लॉकों में 25 लाख लोगों तक पहुंच बनाने और 35 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में 100 से अधिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने का लक्ष्य बताया गया है। इसके अलावा बुजुर्गों की स्वास्थ्य जरूरतों पर भी विशेष ध्यान देने की योजना है। करीब 10 लाख बुजुर्गों तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने और 20 हजार से अधिक फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य भी इस व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि Tata Trusts का फोकस अस्पतालों में इलाज उपलब्ध कराने के साथ-साथ बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर भी है।

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कैंसर केयर पर पहले से बड़ा फोकस
Tata Trusts लंबे समय से कैंसर केयर के क्षेत्र में सक्रिय है। संस्था की मौजूदा स्वास्थ्य पहलों में कैंसर की जांच, इलाज और मरीजों के लिए आवश्यक सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने पर जोर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में Tata Trusts के कैंसर केयर कार्यक्रमों के तहत 1,06,626 ओपीडी कंसल्टेशन, 24,874 कीमोथेरेपी साइकिल और 2,879 सर्जरी दर्ज की गईं। इसके अलावा 29,638 मरीजों को रेडियोथेरेपी दी गई और 13,031 नए मरीजों का इलाज किया गया। कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत को देखते हुए इस क्षेत्र में नॉट-फॉर-प्रॉफिट संस्थानों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। खासकर ऐसे मरीजों के लिए जिनके परिवार इलाज का लंबा और महंगा खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते। Tata Trusts की रणनीति में कैंसर उपचार को मरीजों के घरों के करीब पहुंचाने वाले डिस्ट्रीब्यूटेड हेल्थकेयर मॉडल पर भी जोर दिया जा रहा है।

भारत में हेल्थकेयर की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत में हेल्थकेयर सेवाओं की उपलब्धता पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है, लेकिन अभी भी बड़े शहरों और छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर मौजूद है। एक तरफ महानगरों में अत्याधुनिक अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के मरीजों को गंभीर बीमारी की स्थिति में बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता है। इसका असर केवल इलाज की लागत पर नहीं पड़ता, बल्कि यात्रा, रहने, काम से छुट्टी और परिवार के दूसरे खर्च भी बढ़ जाते हैं। ऐसे में यदि नॉट-फॉर-प्रॉफिट अस्पतालों का नेटवर्क अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित होता है, तो इसका संभावित फायदा स्थानीय स्तर पर मरीजों को मिल सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव अस्पतालों के स्थान, विशेषज्ञता, क्षमता और संचालन मॉडल पर निर्भर करेगा।

‘सबसे बड़ा’ बनने से पहले ‘सर्वश्रेष्ठ’ बनना जरूरी: नोएल टाटा
नोएल टाटा ने हेल्थकेयर के साथ-साथ संस्थान निर्माण की सोच को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उनका जोर केवल किसी परियोजना को बड़ा बनाने या अधिक लोगों तक पहुंच बनाने पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक और लंबे समय तक टिकने वाले प्रभाव पर है। यही वजह है कि उन्होंने संस्थानों और संगठनों के लिए केवल आकार को सफलता का पैमाना मानने के बजाय गुणवत्ता और प्रभाव पर ध्यान देने की बात कही है। इस सोच को एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि किसी संस्था के लिए केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए कि वह कितनी बड़ी है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वह अपने क्षेत्र में कितनी प्रभावी और विश्वसनीय है। यानी पहले सर्वश्रेष्ठ बनने की कोशिश, फिर सबसे बड़ा बनने की महत्वाकांक्षा—यह सोच Tata Trusts के नए संस्थागत दृष्टिकोण का अहम हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।

चैरिटी से संस्थान निर्माण की ओर बढ़ रहा Tata Trusts
Tata Trusts भारत में परोपकारी गतिविधियों के लिए लंबे समय से जाना जाता है। लेकिन अब संस्था की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पारंपरिक रूप से जहां परोपकार का मतलब किसी परियोजना को वित्तीय सहायता देना माना जाता था, वहीं अब Tata Trusts ऐसे संस्थान और सिस्टम बनाने पर जोर दे रहा है जो लंबे समय तक अपने क्षेत्र में प्रभाव पैदा कर सकें। इसका उदाहरण स्वास्थ्य, कैंसर केयर, शिक्षा और रिसर्च से जुड़े संस्थानों में देखा जा सकता है। Tata Memorial Hospital, Tata Institute of Fundamental Research और Indian Institute of Science जैसी संस्थागत विरासत को आगे बढ़ाने की सोच भी इसी दृष्टिकोण से जुड़ी हुई है।

देश की युवा प्रतिभाओं के पलायन पर भी चिंता
नोएल टाटा ने भारत से युवा प्रतिभाओं के विदेश जाने यानी ब्रेन ड्रेन के मुद्दे पर भी चिंता जताई है। भारत में बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रिसर्च, टेक्नोलॉजी और दूसरे विशेषज्ञ क्षेत्रों में आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं। लेकिन बेहतर अवसर, रिसर्च सुविधाएं और वैश्विक स्तर के संस्थानों की तलाश में कई प्रतिभाशाली युवा विदेश चले जाते हैं। Tata Trusts अब ऐसे संस्थान और अवसर तैयार करने की दिशा में काम करना चाहता है, जहां देश के युवाओं को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, रिसर्च और इनोवेशन के अवसर भारत में ही मिल सकें। यह रणनीति केवल रोजगार पैदा करने तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसा संस्थागत वातावरण तैयार करना है, जहां भारतीय प्रतिभाएं देश में रहकर वैश्विक स्तर का काम कर सकें।

युवाओं के लिए संस्थान बनाने पर क्यों जोर?
किसी देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में केवल पूंजी ही महत्वपूर्ण नहीं होती। उच्च गुणवत्ता वाली मानव प्रतिभा, रिसर्च और इनोवेशन भी उतने ही जरूरी हैं। अगर प्रतिभाशाली युवा देश में ही उच्चस्तरीय शिक्षा और रिसर्च के अवसर पा सकें, तो इससे लंबे समय में भारत के संस्थानों को मजबूत किया जा सकता है। यही वजह है कि Tata Trusts की नई सोच में हेल्थकेयर के साथ-साथ शिक्षा, रिसर्च, इनोवेशन और संस्थान निर्माण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है।

FY26 में Tata Trusts ने खर्च किए ₹1,556 करोड़ से ज्यादा
Tata Trusts की गतिविधियों का पैमाना उसके वित्तीय आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में Tata Trusts ने कुल ₹1,556.31 करोड़ वितरित किए। इसमें ग्रामीण विकास के लिए करीब ₹457.62 करोड़, शिक्षा के लिए ₹270.26 करोड़, कैंसर केयर के लिए ₹178.46 करोड़ और हेल्थकेयर के लिए करीब ₹105.97 करोड़ शामिल रहे। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि संस्था का फोकस केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर व्यापक सामाजिक प्रभाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

आने वाले वर्षों में कितना बदल सकता है हेल्थकेयर मॉडल?
अगर 40 से 50 नॉट-फॉर-प्रॉफिट अस्पतालों की योजना बड़े पैमाने पर लागू होती है, तो इसका असर केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा। एक ओर इससे जरूरतमंद मरीजों के लिए इलाज के नए विकल्प पैदा हो सकते हैं, वहीं दूसरी ओर क्रॉस-सब्सिडी मॉडल के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं की आर्थिक पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया जा सकता है। इसके साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के साथ साझेदारी, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के प्रशिक्षण से स्वास्थ्य व्यवस्था को निचले स्तर से मजबूत करने की कोशिश भी की जा रही है। हालांकि, इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित अस्पताल किन शहरों और जिलों में बनाए जाते हैं, उनकी क्षमता कितनी होती है, सब्सिडी का मॉडल कैसे लागू किया जाता है और गरीब मरीजों की पहचान एवं सहायता की व्यवस्था कितनी पारदर्शी होती है।

Tata Trusts के लिए भी बड़ी जिम्मेदारी
इतने बड़े अस्पताल नेटवर्क का निर्माण और संचालन आसान नहीं होगा। अस्पताल बनाना पहला चरण है, लेकिन लंबे समय तक उन्हें उच्च गुणवत्ता के साथ चलाना कहीं बड़ी चुनौती होगी। विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, नर्सिंग स्टाफ, आधुनिक चिकित्सा उपकरण, दवाओं की कीमत, अस्पताल संचालन की लागत और जरूरतमंद मरीजों तक सब्सिडी पहुंचाना—ये सभी पहलू महत्वपूर्ण होंगे। अगर Tata Trusts अपने नॉट-फॉर-प्रॉफिट मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू करता है, तो यह भारत में सामाजिक क्षेत्र के हेल्थकेयर मॉडल के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

बड़ा सवाल: क्या बदल पाएगा भारत का हेल्थकेयर मॉडल?
नोएल टाटा की योजना को केवल 40-50 अस्पताल बनाने की परियोजना के तौर पर देखना शायद इसके व्यापक उद्देश्य को सीमित कर देगा। इसके पीछे एक ऐसी संस्थागत सोच दिखाई देती है जिसमें हेल्थकेयर, सामाजिक प्रभाव, वित्तीय स्थिरता और प्रतिभा निर्माण को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने के लिए क्रॉस-सब्सिडी मॉडल की बात है, दूसरी तरफ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और कैंसर केयर को मजबूत करने की योजना है। वहीं शिक्षा, रिसर्च और इनोवेशन के जरिए देश की युवा प्रतिभाओं को भारत में अवसर देने की कोशिश भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।

अब निगाह इस बात पर होगी कि Tata Trusts इस मास्टरप्लान को किस गति से जमीन पर उतारता है और प्रस्तावित नॉट-फॉर-प्रॉफिट अस्पताल वास्तव में देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में कितना बदलाव ला पाते हैं।

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