H-1B वीजा विवाद: जेडी वेंस के ‘बंधुआ मजदूर’ वाले बयान पर भारत का जवाब, कांग्रेस ने सरकार को घेरा

JD Vance

New Delhi: अमेरिका में भारतीय आईटी पेशेवरों और बड़ी टेक कंपनियों को लेकर विवाद गहरा गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा पर काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘Foreign Indentured Servants’ यानी बंधुआ मजदूरों जैसा बताते हुए कंपनियों पर अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कामगारों को रखने का आरोप लगाया। इसके बाद भारत सरकार ने इस भाषा को बेहद आपत्तिजनक बताया है। दूसरी ओर, अमेरिकी सरकार ने इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट समेत कई कंपनियों के लिए ग्रीन कार्ड से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक लगाई है। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरते हुए कहा है कि ताकतवर लोगों की खुशामद करने से देश के हित सुरक्षित नहीं होते।

जेडी वेंस ने H-1B कर्मचारियों को लेकर क्या कहा?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने 8 अक्टूबर को वीजा धोखाधड़ी और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती से जुड़े मुद्दों पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में H-1B वीजा कार्यक्रम की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के बाद कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं। वेंस का दावा था कि H-1B वीजा पर अमेरिका आने वाले कुछ कर्मचारियों की नौकरी और आव्रजन स्थिति उनके नियोक्ता पर निर्भर होती है। नौकरी छूटने की स्थिति में उन्हें अमेरिका में अपना प्रवास जारी रखने में मुश्किल हो सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने विदेशी कर्मचारियों के लिए ‘Foreign Indentured Servants’ शब्द का इस्तेमाल किया। वेंस ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और रोजगार पर दबाव बनाने के लिए कर रही हैं। हालांकि, ये अमेरिकी प्रशासन के आरोप हैं और इन्हें सभी H-1B वीजा धारकों के बारे में स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

भारत ने कहा- ऐसी शब्दावली बेहद आपत्तिजनक
जेडी वेंस के बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। मंत्रालय ने विदेशी कर्मचारियों और भारतीय पेशेवरों के लिए इस्तेमाल की गई इस शब्दावली को अनुचित और बेहद आपत्तिजनक बताया। भारत का कहना है कि भारतीय पेशेवर अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीकी नवाचार, शोध और उत्पादकता में योगदान देते हैं। कुशल पेशेवरों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही से केवल कर्मचारियों को ही अवसर नहीं मिलता, बल्कि अमेरिकी कंपनियों को भी विशेषज्ञ प्रतिभा का लाभ मिलता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि अमेरिका का इतिहास प्रवासियों के योगदान से आकार लेता रहा है। ऐसे में भारतीय पेशेवरों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल दोनों देशों के बीच प्रतिभा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग की भावना के अनुकूल नहीं है।

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इंफोसिस, टाटा, विप्रो समेत कंपनियों पर अमेरिकी कार्रवाई
विवाद के बीच अमेरिकी प्रशासन ने कई बड़ी आईटी कंपनियों को Permanent Labor Certification यानी PERM कार्यक्रम के तहत आवेदन करने से अस्थायी रूप से रोकने की घोषणा की है। इस सूची में कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी कंपनियां शामिल हैं। माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी पर भी कार्रवाई की गई है। अमेरिकी अधिकारियों ने संबंधित कंपनियों के खिलाफ चल रही संघीय जांच और वीजा कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग को इस कार्रवाई से जोड़ा है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए इन कार्यक्रमों का अनुचित इस्तेमाल किया और इससे अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार पर असर पड़ा। इन आरोपों के संदर्भ में कंपनियों के पक्ष और जांच के अंतिम निष्कर्षों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। किसी कंपनी को जांच के दौरान कार्यक्रम से निलंबित किया जाना अपने-आप में उसके खिलाफ लगे सभी आरोपों को साबित नहीं करता।

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H-1B वीजा और PERM में क्या है अंतर?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए H-1B वीजा और PERM प्रक्रिया के बीच अंतर जानना जरूरी है।

  • H-1B वीजा: अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को निर्धारित शर्तों के तहत नौकरी पर रखने की अनुमति देता है।
  • PERM प्रक्रिया: अमेरिका में रोजगार-आधारित कुछ ग्रीन कार्ड आवेदनों के लिए श्रम प्रमाणन की एक अहम प्रक्रिया है। इसके जरिए नियोक्ता पात्र विदेशी कर्मचारी के स्थायी निवास की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
  • मौजूदा वीजा पर असर: भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, PERM आवेदन प्रक्रिया पर रोक लगने से मौजूदा H-1B वीजा अपने-आप अमान्य नहीं होते। हालांकि, प्रभावित कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में देरी या बाधा आ सकती है।
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इसलिए अमेरिकी कार्रवाई को सभी भारतीय H-1B वीजा धारकों के वीजा रद्द होने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। इसका सीधा असर प्रभावित कंपनियों के PERM आवेदन और संबंधित कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

कांग्रेस बोली- ‘बुलियों की खुशामद कभी काम नहीं आती’
अमेरिकी कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर कहा कि अमेरिकी सरकार के कदमों ने एक बार फिर साबित किया है कि ‘बुलियों की खुशामद कभी काम नहीं आती।’जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए केंद्र सरकार ने जो कदम उठाए, उनसे भारत के हितों की रक्षा सुनिश्चित नहीं हुई। उन्होंने अमेरिकी कार्रवाई को भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए नुकसानदेह बताते हुए सरकार से जवाब देने की मांग की। कांग्रेस नेता ने UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क से जुड़े फैसले का भी उल्लेख किया। उनका दावा है कि इस कदम से अमेरिकी कंपनियों को लाभ मिल सकता है। यह कांग्रेस की राजनीतिक व्याख्या है; इसके प्रभाव का आकलन संबंधित नीति और उसके क्रियान्वयन के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

भारत के पास जवाब देने के विकल्प होने का कांग्रेस का दावा
जयराम रमेश ने कहा कि भारत के पास संसद से पारित कानूनों के तहत जवाब देने के विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने विशेष रूप से डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और उससे जुड़े नियमों का उल्लेख किया। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार को भारतीय पेशेवरों और कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए अधिक दृढ़ता से अपना पक्ष रखना चाहिए। हालांकि, जयराम रमेश ने जिन कानूनी विकल्पों का उल्लेख किया है, उनके इस्तेमाल की व्यवहारिकता और कानूनी सीमाओं का निर्धारण संबंधित कानूनों और परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की ओर से कांग्रेस के इन राजनीतिक आरोपों पर अलग से प्रतिक्रिया सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

भारतीय आईटी सेक्टर और पेशेवरों पर क्या पड़ सकता है असर?
अमेरिका भारतीय आईटी कंपनियों और तकनीकी पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। PERM प्रक्रिया पर रोक से प्रभावित कंपनियों के उन कर्मचारियों को परेशानी हो सकती है, जो रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के जरिए अमेरिका में स्थायी निवास हासिल करने की प्रक्रिया में हैं। संभावित असर में ग्रीन कार्ड आवेदनों में देरी, कर्मचारियों की दीर्घकालिक योजना में अनिश्चितता और कंपनियों की मानव संसाधन रणनीति में बदलाव शामिल हो सकते हैं। हालांकि, वास्तविक असर प्रत्येक कंपनी, कर्मचारी की स्थिति और संबंधित आवेदन की अवस्था पर निर्भर करेगा। भारतीय आईटी उद्योग के लिए यह घटनाक्रम अमेरिकी बाजार में काम करने के नियमों, प्रतिभा की आवाजाही और कर्मचारियों के भविष्य से जुड़े सवालों को फिर से केंद्र में लाता है। भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी तथा आर्थिक सहयोग के लिए इन मुद्दों पर स्पष्ट संवाद महत्वपूर्ण होगा।

अब आगे क्या?
फिलहाल इस विवाद में तीन प्रमुख मुद्दे सामने हैं—जेडी वेंस की विवादित शब्दावली, अमेरिकी प्रशासन की ओर से कंपनियों के PERM कार्यक्रम पर रोक और भारत में इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस। भारत सरकार ने बयान पर आपत्ति जताते हुए भारतीय पेशेवरों के योगदान और प्रतिभा की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही के पारस्परिक लाभों पर जोर दिया है। वहीं, कांग्रेस ने सरकार से भारतीय हितों की रक्षा के लिए कदम उठाने की मांग की है। आने वाले दिनों में प्रभावित कंपनियों की स्थिति, अमेरिकी जांच और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर पड़ने वाले वास्तविक असर से यह स्पष्ट होगा कि इस कार्रवाई का भारतीय आईटी पेशेवरों पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ता है।

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