कैंसर का दर्द सहना जरूरी नहीं, इलाज के साथ पैलिएटिव केयर पर विशेषज्ञों का जोर

Palliative Care Day

रांची कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर दिवस पर विशेषज्ञों ने कहा—कैंसर के निदान के समय से ही शुरू हो उपशामक देखभाल

रांची : कैंसर का उपचार केवल बीमारी को नियंत्रित करने या ट्यूमर को खत्म करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मरीज को दर्द से राहत, मानसिक संबल, भावनात्मक सहयोग और सम्मानजनक जीवन देना भी उपचार का अहम हिस्सा है। इसी संदेश के साथ रांची कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (आरसीएचआरसी) में रविवार को विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि पैलिएटिव केयर यानी उपशामक देखभाल को कैंसर के अंतिम चरण तक टालना उचित नहीं है। इसे बीमारी के निदान के समय से ही मरीज की उपचार योजना में शामिल किया जाना चाहिए। इससे दर्द और अन्य तकलीफदेह लक्षणों को नियंत्रित करने, जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने तथा मरीज और उसके परिवार को बीमारी के विभिन्न चरणों में सहयोग देने में मदद मिल सकती है। कार्यक्रम का विषय “दर्द प्रबंधन: पैलिएटिव केयर का एक अनिवार्य हिस्सा” था। इसमें चिकित्सकों, मरीजों, देखभालकर्ताओं और अन्य प्रतिभागियों ने कैंसर के उपचार में संवेदनशीलता, गरिमा और मरीज-केंद्रित देखभाल की भूमिका पर चर्चा की।

कैंसर के इलाज का जरूरी हिस्सा है पैलिएटिव केयर
आरसीएचआरसी के मेडिकल डायरेक्टर एवं वरिष्ठ रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. गौतम कुमार शरण ने आधुनिक कैंसर चिकित्सा में पैलिएटिव केयर की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपशामक देखभाल को केवल उन मरीजों के लिए नहीं समझना चाहिए, जिनकी बीमारी अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उनके अनुसार, पैलिएटिव केयर संपूर्ण कैंसर उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य मरीज की तकलीफों को कम करना, उपचार के दौरान उसकी जरूरतों को समझना और उसे बेहतर जीवन जीने में सहायता देना है। विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि पैलिएटिव केयर और बीमारी का उपचार साथ-साथ चल सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि मरीज का कैंसर का इलाज बंद कर दिया गया है। बल्कि जरूरत के अनुसार दर्द नियंत्रण और अन्य सहायक सेवाओं को मुख्य उपचार के साथ जोड़ा जा सकता है।

झारखंड में पैलिएटिव केयर सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और रांची स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री के निदेशक डॉ. विजय कुमार चौधरी ने झारखंड में पैलिएटिव केयर सेवाओं का विस्तार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय पैलिएटिव केयर कार्यक्रम के संदर्भ में कहा कि मरीजों और उनके परिवारों तक इन सेवाओं की पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को समय पर सहायता मिल सके, इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं में जागरूकता, उपलब्धता और बेहतर समन्वय की जरूरत है। पैलिएटिव केयर की पहुंच बढ़ने से मरीजों के साथ-साथ उनके परिजनों को भी बीमारी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने में मदद मिल सकती है।

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शुरुआती चरण से देखभाल शुरू करने पर जोर
आरसीएचआरसी की पैलिएटिव मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. मनीषा ने “निदान से पहले, उपचार से आगे: कैंसर चिकित्सा में प्रारंभिक पैलिएटिव केयर का समावेश” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने मरीजों के अनुभवों के माध्यम से समझाया कि शुरुआती चरण से उपशामक देखभाल शुरू करना क्यों महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मरीज को बीमारी के हर चरण में आराम, संवेदना, सम्मान और आशा के साथ जीने का अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार, दर्द और तकलीफ को चुपचाप सहना मरीज की मजबूरी नहीं होना चाहिए। उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन और देखभाल के माध्यम से कई लक्षणों को नियंत्रित करने तथा मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।

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पैलिएटिव केयर को लेकर भ्रांतियां दूर करना जरूरी
पुणे स्थित सिम्बायोसिस सेंटर फॉर असिस्टेड केयर की प्रमुख डॉ. प्रियदर्शिनी कुलकर्णी ने पैलिएटिव केयर से जुड़ी प्रचलित भ्रांतियों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि गलत धारणाओं के कारण कई बार मरीजों को समय पर उपशामक देखभाल नहीं मिल पाती। कुछ लोग इसे केवल जीवन के अंतिम समय में दी जाने वाली सेवा मानते हैं, जबकि इसका उपयोग गंभीर बीमारी के उपचार के विभिन्न चरणों में भी किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि मरीजों और उनके परिवारों को पैलिएटिव केयर के उद्देश्य और उपलब्ध विकल्पों की सही जानकारी देना आवश्यक है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे समय पर चिकित्सकीय सलाह ले सकें।

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दर्द केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और सामाजिक भी
रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के एनेस्थीसिया, पेन, पैलिएटिव केयर एवं क्रिटिकल केयर विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वसीमुल होदा ने ‘टोटल पेन’ यानी समग्र पीड़ा की अवधारणा समझाई। उन्होंने बताया कि गंभीर बीमारी से जुड़ा दर्द केवल शारीरिक तकलीफ तक सीमित नहीं रहता। मानसिक तनाव, सामाजिक परिस्थितियां, पारिवारिक चिंताएं और आध्यात्मिक परेशानियां भी मरीज के दर्द के अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए मरीज की देखभाल करते समय उसके शारीरिक लक्षणों के साथ मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक जरूरतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। मरीज की परिस्थितियों को समझकर तैयार की गई देखभाल योजना अधिक संवेदनशील और समग्र दृष्टिकोण प्रदान कर सकती है।

जीवन के अंतिम चरण में भी गरिमा और आराम जरूरी
रांची के भगवान महावीर मेडिका हॉस्पिटल के क्रिटिकल केयर कंसल्टेंट डॉ. मनोज कुमार राय ने जीवन के अंतिम चरण में होने वाली तकलीफों के प्रबंधन पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जब उपचार का मुख्य उद्देश्य बीमारी को ठीक करने के बजाय पीड़ा कम करना हो, तब भी मरीज को आराम, गरिमा और संवेदनशील देखभाल उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण है।

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