GST काउंसिल में झारखंड की बड़ी मांग, कोयले को GST से बाहर कर VAT लगाने की अनुमति मांगी
रांची/नई दिल्ली: झारखंड सरकार ने 8 अक्टूबर को हुई GST काउंसिल की 57वीं बैठक में राज्य के राजस्व और आर्थिक हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। झारखंड की ओर से वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने राज्य का पक्ष रखते हुए कोयले को GST के दायरे से बाहर करने और उस पर दोबारा VAT लगाने की अनुमति देने की मांग रखी। इसके साथ ही उन्होंने GST व्यवस्था में बदलाव के कारण राज्य पर पड़े अतिरिक्त आर्थिक बोझ और केंद्र से जुड़े पुराने बकाये का मुद्दा भी उठाया। झारखंड सरकार का तर्क है कि राज्य देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में शामिल है, लेकिन कोयला खनन के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का बड़ा हिस्सा झारखंड को झेलना पड़ता है। वहीं GST व्यवस्था में खपत आधारित टैक्स प्रणाली के कारण कोयले से मिलने वाले राजस्व का लाभ मुख्य रूप से उन राज्यों को मिलता है, जहां कोयले का इस्तेमाल होता है।
कोयले को GST से बाहर करने की मांग क्यों?
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने काउंसिल में कोयले को GST के दायरे से बाहर करने का मुद्दा उठाया। राज्य सरकार के मुताबिक GST लागू होने से पहले कोयला VAT व्यवस्था के तहत आता था और झारखंड को कोयले की बिक्री पर राज्य कर के रूप में राजस्व मिलता था। झारखंड सरकार का कहना है कि GST लागू होने के बाद यह व्यवस्था बदल गई। अब कोयला जिस राज्य में बिजली उत्पादन जैसे अंतिम उपयोग में जाता है, वहां GST के राजस्व का लाभ मिलता है। ऐसे में कोयला उत्पादन का आर्थिक और पर्यावरणीय दबाव झेलने वाले झारखंड के राजस्व हित प्रभावित होते हैं। राज्य का प्रस्ताव है कि कोयले को GST से बाहर कर उस पर VAT लगाने की अनुमति दी जाए। सरकार का दावा है कि इससे कोयला उत्पादक राज्यों को अपने संसाधनों से अधिक प्रत्यक्ष राजस्व प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
18 फीसदी से 5 फीसदी टैक्स की दलील
झारखंड सरकार ने अपनी मांग के साथ बिजली की कीमत से जुड़ा तर्क भी रखा है। राज्य के मुताबिक, यदि कोयले को GST के मौजूदा ढांचे से बाहर कर VAT के तहत लाया जाता है और कर दर 18 फीसदी से घटकर 5 फीसदी होती है, तो इससे बिजली उत्पादन की लागत में कमी आ सकती है। सरकार का तर्क है कि कोयला बिजली उत्पादन की प्रमुख लागतों में शामिल है। इसलिए कोयले पर कम कर का प्रभाव आगे चलकर बिजली उत्पादन की लागत पर पड़ सकता है और इससे बिजली सस्ती होने की संभावना बनेगी। हालांकि, कर व्यवस्था में बदलाव का वास्तविक असर केंद्र और राज्यों के राजस्व, बिजली उत्पादन की लागत और अंतिम उपभोक्ता कीमतों पर किस तरह पड़ेगा, यह प्रस्ताव की अंतिम संरचना और उसके लागू होने पर निर्भर करेगा।
GST बदलाव से 22 हजार करोड़ के अतिरिक्त बोझ का मुद्दा
GST काउंसिल की बैठक में वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार द्वारा नियमों में किए गए विभिन्न बदलावों से झारखंड पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी मुद्दा उठाया। राज्य सरकार के अनुसार, अलग-अलग नीतिगत बदलावों और राजस्व हिस्सेदारी में परिवर्तन के कारण झारखंड पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा है। वित्त मंत्री ने इस मुद्दे को राज्य के वित्तीय हितों से जोड़ते हुए केंद्र के समक्ष रखा और राज्य को होने वाले नुकसान की भरपाई की मांग की।
GST क्षतिपूर्ति बंद होने से भी नुकसान का दावा
झारखंड सरकार ने GST Compensation की व्यवस्था खत्म होने का मुद्दा भी उठाया। राज्य के अनुसार, क्षतिपूर्ति व्यवस्था समाप्त होने से झारखंड को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। GST लागू होने के बाद संक्रमणकालीन अवधि में राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए क्षतिपूर्ति व्यवस्था बनाई गई थी। झारखंड सरकार का कहना है कि इसकी समाप्ति का असर राज्य के वित्तीय संसाधनों पर पड़ा है। झारखंड के आर्थिक सर्वेक्षण में भी GST क्षतिपूर्ति से मिलने वाली राशि में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
मनरेगा की जगह VB-G-RAM-G का भी उठाया मुद्दा
वित्त मंत्री ने ग्रामीण रोजगार योजना के ढांचे में बदलाव से राज्य पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ का मामला भी उठाया। राज्य सरकार के अनुसार, मनरेगा में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी अधिक थी, जबकि नए VB-G-RAM-G ढांचे में राज्य की वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ गई है। झारखंड सरकार का दावा है कि इस बदलाव के कारण राज्य पर सालाना करीब 4,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। राज्य सरकार ने इसे भी केंद्र के समक्ष वित्तीय दबाव के एक प्रमुख कारण के तौर पर रखा।
MMDR Act में संशोधन से 1,400 करोड़ का नुकसान?
GST काउंसिल में MMDR Act में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन का मुद्दा भी उठाया गया। झारखंड सरकार का दावा है कि इन बदलावों की वजह से राज्य को सालाना करीब 1,400 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य के लिए खनन और उससे मिलने वाला राजस्व राज्य के वित्तीय संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में खनन से जुड़े कानूनों में बदलाव का असर राज्य के राजस्व पर पड़ने की बात सरकार लगातार उठाती रही है।
1.36 लाख करोड़ रुपये के पुराने बकाये की मांग
बैठक में झारखंड सरकार ने केंद्र के पास अपने पुराने 1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाये का मुद्दा भी उठाया। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने राज्य के लंबित दावों का भुगतान करने की मांग रखी। झारखंड सरकार लंबे समय से केंद्र के समक्ष विभिन्न मदों में लंबित राशि का मुद्दा उठाती रही है। GST काउंसिल की बैठक में इसे दोबारा उठाए जाने से राज्य के राजस्व अधिकारों और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों को लेकर बहस एक बार फिर सामने आ गई है।
कोयला उत्पादक राज्य बनाम खपत वाले राज्यों का सवाल
झारखंड सरकार की कोयले को GST से बाहर करने की मांग के पीछे सबसे बड़ा तर्क उत्पादन और खपत के बीच राजस्व वितरण का है। झारखंड में कोयले का बड़े पैमाने पर खनन होता है। इसके बाद यही कोयला बिजली उत्पादन और दूसरे औद्योगिक उपयोग के लिए देश के अलग-अलग राज्यों में भेजा जाता है। राज्य सरकार का कहना है कि खनन से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव झारखंड को झेलने पड़ते हैं, जबकि GST व्यवस्था में अंतिम खपत वाले राज्य को कर का लाभ मिलता है। इसी आधार पर झारखंड सरकार चाहती है कि कोयला उत्पादक राज्यों को अतिरिक्त राजस्व अधिकार मिले।
झारखंड के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
झारखंड सरकार के लिए GST और खनन से जुड़े राजस्व का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिज संसाधनों की बड़ी भूमिका है। राज्य का वाणिज्यिक कर विभाग भी आंतरिक संसाधन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, GST काउंसिल में किसी मुद्दे को उठाया जाना और उस पर अंतिम निर्णय होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए कोयले को GST से बाहर करने या VAT लगाने की झारखंड की मांग पर अंतिम फैसला काउंसिल और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा। फिलहाल 8 अक्टूबर की बैठक में झारखंड ने अपने कोयला राजस्व, GST क्षतिपूर्ति, केंद्र से लंबित बकाया, MMDR Act और राज्य पर बढ़े वित्तीय बोझ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है।
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