भूदान की जमीन पर हाईकोर्ट की रोक के बावजूद मापी का आरोप, BSF कैंप को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश
1955 और 1970 में भूदान में मिली जमीन का दावा
नवादा/रजौली: रजौली प्रखंड के रजौली पूर्वी पंचायत अंतर्गत नौकाडीह गांव में भूदान के तहत मिली जमीन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि भूदान की जमीन पर उच्च न्यायालय की ओर से रोक लगाए जाने के बावजूद BSF कैंप के निर्माण के लिए भूमि की मापी कराई जा रही है। मापी को लेकर गांव के भूदान परचाधारियों और किसानों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें BSF कैंप बनाए जाने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिस जमीन पर वर्षों से उनके परिवार खेती करते आ रहे हैं, यदि उस जमीन को लिया जाता है तो सरकार उन्हें भूमि के बदले भूमि या उचित मुआवजा उपलब्ध कराए। ग्रामीणों का कहना है कि बिना मुआवजे के जमीन चली गई तो उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
‘कैंप बने, लेकिन हमारी जमीन का उचित मुआवजा मिले’
नौकाडीह गांव के भूदान परचाधारियों का कहना है कि वे BSF कैंप निर्माण के विरोध में नहीं हैं। उनकी मुख्य मांग जमीन के बदले उचित मुआवजे की है। ग्रामीणों ने कहा कि यदि सरकार को कैंप के लिए उनकी जमीन की आवश्यकता है तो या तो दूसरी जगह जमीन के बदले जमीन दी जाए या फिर अधिग्रहित की जा रही भूमि का उचित मुआवजा दिया जाए, ताकि वे दूसरी जगह जमीन खरीदकर खेती और परिवार का भरण-पोषण कर सकें। ग्रामीणों के मुताबिक, वे लंबे समय से इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और उनकी आजीविका का प्रमुख आधार यही भूमि है।
1955 और 1970 में भूदान में मिली जमीन का दावा
ग्रामीणों ने बताया कि उनके पूर्वजों को वर्ष 1955 और 1970 के दौरान भूदान यज्ञ समिति, बुनियादगंज गया के माध्यम से जमीन मिली थी। इसके बाद से उनके परिवार लगातार उक्त जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। परचाधारियों का कहना है कि वर्ष 1973-74 में अंचलाधिकारी, रजौली की ओर से उन्हें नोटिस मिला था और इसी प्रक्रिया के आधार पर भूदान से पर्चा भी प्राप्त हुआ। ग्रामीणों के अनुसार, BSF कैंप से जुड़े अधिकारियों के समक्ष भी उन्होंने अपने जमीन के पर्चे और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं।
दाखिल-खारिज और जमीन की रसीद कटने का भी दावा
परचाधारियों का दावा है कि उनके पूर्वजों के नाम से जमीन की रसीद कटती रही है और जमीन का दाखिल-खारिज भी हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1985 तक पुराने रसीद कटे हैं, जबकि वर्ष 1993-94 के बाद नए रसीद जारी होते रहे हैं। उनका कहना है कि वर्ष **2025-26 तक भी जमीन का रसीद कटा हुआ है। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि अंचलाधिकारी न्यायालय के केस नंबर 11/1993-94 में भूदान जमीन के दाखिल-खारिज से संबंधित आदेश के बाद भी वे लगातार जमीन की रसीद कटाते रहे हैं। हालांकि, इन दस्तावेजों और ग्रामीणों के दावों की अंतिम वैधानिक स्थिति संबंधित राजस्व रिकॉर्ड और न्यायालय के आदेशों से ही स्पष्ट होगी।
खेतों में लगी है खरीफ और दलहन की फसल
ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन की मापी की जा रही है, उस पर वर्तमान में भी खेती हो रही है। उनके मुताबिक जमीन पर कुरथी, कुसी, केराय, चना, धान और मसूर जैसी मौसमी फसलें लगी हुई हैं। परचाधारियों का कहना है कि खेतों में लगी फसल इस बात का प्रमाण है कि वे वर्षों से जमीन का उपयोग खेती के लिए करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि अचानक जमीन चले जाने से उनके परिवारों की आय का प्रमुख साधन समाप्त हो जाएगा।
‘जमीन गई तो भूमिहीन हो जाएंगे’
भूदान परचाधारियों का कहना है कि यदि बिना उचित मुआवजे के उनकी जमीन ले ली जाती है तो वे भूमिहीन हो जाएंगे। ग्रामीणों ने सरकार से आग्रह किया है कि उनके परिवारों की स्थिति को देखते हुए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में उनके अधिकारों और आजीविका का ध्यान रखा जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास कार्य या BSF कैंप निर्माण के विरोध में नहीं हैं। वे चाहते हैं कि सरकार कैंप के लिए जमीन ले, लेकिन उसके बदले उन्हें उचित मुआवजा या वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जाए।
मुआवजा नहीं मिला तो आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर सरकार की ओर से उचित कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। परचाधारियों ने कहा कि जरूरत पड़ने पर धरना-प्रदर्शन, जन आंदोलन और सड़क जाम किया जाएगा। इसके साथ ही ग्रामीण जिलाधिकारी के समक्ष भी अपनी शिकायत और जमीन से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत कर न्याय की गुहार लगाएंगे। फिलहाल नौकाडीह में भूदान की जमीन की मापी को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार ग्रामीणों की मुआवजे अथवा वैकल्पिक भूमि की मांग पर क्या कदम उठाती है और न्यायालय की ओर से लगाए गए कथित रोक के बीच मापी की प्रक्रिया को लेकर स्थिति क्या स्पष्ट होती है।
ग्रामीणों की मुख्य मांगें
- BSF कैंप निर्माण से ग्रामीणों को आपत्ति नहीं है।
- भूदान की जमीन लिए जाने पर भूमि के बदले भूमि दी जाए।
- वैकल्पिक भूमि संभव नहीं होने पर उचित मुआवजा दिया जाए।
- न्यायालय की रोक और जमीन से जुड़े दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट की जाए।
- अधिग्रहण की स्थिति में खेतों में लगी फसल और ग्रामीणों की आजीविका का भी ध्यान रखा जाए।
- भूदान की जमीन पर हाईकोर्ट की रोक के बावजूद मापी का आरोप, BSF कैंप को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश1955 और 1970 में भूदान में मिली जमीन का दावा नवादा/रजौली: रजौली प्रखंड के रजौली पूर्वी पंचायत अंतर्गत नौकाडीह गांव में भूदान के तहत मिली जमीन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि भूदान की जमीन पर उच्च न्यायालय की ओर से रोक लगाए जाने के बावजूद BSF कैंप के…
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